Sunday, June 11, 2017

सात फेरे

मुस्कान ने उनकी कहर बरपा दिया

दिल की इस नाजुक जमीं पर

वज्रपात का कोहराम मचा दिया

आघात गहरा इतना था

सहम गया पूरा तन बदन

सदमा झेल ना पाया ए मन

ओर हो गया इसका चीरहरण

दिल भी यह कहां उनसे कम था

कम्बख्त ने बना लिया

उनकी हसीं को ही अपना हमसफ़र

बाँध लिया बंधन में उनको

फिर सात फेरों के संग

सात फेरों के संग

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-06-2017) को
    रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर; चर्चामंच 2644
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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