Wednesday, September 21, 2016

आईना

आईना देखकर जीना हम सीख गए

इन आँखों में चेहरा आपका देखकर

मुस्कराना हम सीख गए

लिखी थी आयतें दिल ने जो प्यार की

रूबरू करा गयी आईना ईबादत आपकी

उम्र लंबी थी मुलाक़ात की इस शाम की

आईना रो पड़ा आपने जब आवाज़ दी

तड़प के दिल ने कहा चली आ ए मौशिकी

तोड़ के ए रश्मे चली आ गली प्यार की

क्यूँ पता आपका अब आईने से पुछूं

नूर आपका अब अपनी आँखों में पढ़ूँ

उम्र लंबी हो इस प्यार की

आईना भी मुस्करा पड़े

देख नजरें ईनायत आपकी

कदम

क़दमों का क्या गुनाह

बिन पिये ए लड़खड़ाते हैं

दो बूँद शराब की

फिर से क़दमों में घुँघरू बंध जाते हैं

नचाती हैं जब दुनिया

बिन पिये ही ए बहक जाते हैं

ओर संभलने को फिर से

मयखाने चले आते हैं

आहिस्ता ही सही

भूल रंजो गम

सुरूर में इसकी

कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं

कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं

माया

कुदरत कैसी हैं तेरी माया

हर तरफ़ उसका ही हैं साया

क्या खबर उस दिल को

इस घरौंदे में

नशा उसका ही हैं छाया

हर मोड़ मिल जाती उसकी ही छाया

बिन कहे ही वो करीब चला हैं आया

ए खुदा कैसी तेरी हैं यह माया

दिल की इस बंजर जमीं को

तूने ही खिलखिलाना हैं सिखलाया

Tuesday, September 13, 2016

नींद

तारों भरी रात में

नींद आज फिर से दगा दे गयी

चाँद के इन्तजार में

हमें तन्हा अकेला छोड़ गयी

राह तकते तकते

मानों सदियाँ गुजर गयी

नयनों से जैसे निंदिया महरूम हो गयी

छिप गया ओझल होकर ना जाने वो कहा

निंदिया भी उसकी तलाश में

आँखों से भटक गयी

खुली पलकों में स्याह रात गुजर गयी

पर वो चाँद ना निकला

जिसके इन्तजार में रात ढल गयी

नींद आज फिर से दगा दे गयी 

Tuesday, September 6, 2016

अमृत बूँदों की मिठास

मौन क्यों हैं तू घटा आज

बरसी नहीं क्यों फिर बदरी आज

प्रचंड ताप सूर्य ने हैं दिखलाया

जल रही मरुधर की भी छाया

मच रहा हाहाकार चहुँ ओर

रुंदन कर रही धरती भी आज

बिन जल मृत्यु शैया पर लेटी हु आज

मृगतृष्णा के भँवर में

लुप्त ना हो जाए सागर कही आज

अस्तित्व ही कुदरत का

लग गया मानो दांव पे आज

इसलिए गरज बरस घटा फिर से आज

ताकि मिल जाए जीवन अस्तित्व को

अमृत बूँदों की मिठास  

अमृत बूँदों की मिठास