Wednesday, May 25, 2016

अल्फ़ाज

मशरूफ था मैं

उसे अपने अल्फ़ाज बनाने में

सँवार ना पाया लफ्ज़

मगर उसके लिए किराने से

बेकरार थे शब्द जो मेरे

लब उसके छू जाने के लिए

दफ़न रह गए वो सूनी आवाज़ बनकर

सीने में मेरे समा के 

कह ना पाया कभी उससे

शाम ए ग़ज़ल मेरी

मेरे अल्फाज़ की पहचान ही है

खन खनाती सी मीठी तेरी बोली

मशगूल रह गया मैं

लिखने में बस कवायद उसकी

ओर वो बन ना पायी कभी

दीवानी अल्फाज़ की मेरी

अल्फाज़ की मेरी 

Friday, May 13, 2016

उधार

इश्क़ बेचने चला था

उधार में दर्द खरीद लाया

नीम हाकिम सब को दिखलाया

मगर दर्द की दवा कोई ना कर पाया

मर्ज ए इतना गहरा हो चला

साकी ने भी किनारा कर लिया

तड़प दिल से आँखों में उतर आयी

पर अश्कों की माला फिर भी मर्ज भुला ना पाई 

कहा फिर दिल ने हौले से

दर्द लिया जिससे निदान उसकी पास

रोग लिया जब इश्क़ का

दुनिया का उसमे क्या काम

करले इकरार उसकी चाहत का

दर्द तुरंत काफूर  जायेगा







Friday, May 6, 2016

गुस्ताखी

माना गुस्ताख थी जिंदगी हमारी

पर शबनम किसीके सहेजना तो गुस्ताखी ना थी

हर कतरा अनमोल था उनकी अश्कों का

क्योंकि उनके हर कतरे में एक पैगाम था

गुस्ताख दिल का करम बस इतना सा था

वो अश्कों में दुनिया भुलाते थे

और हम उसी में जन्नत तलाशते थे

पर परवरदिगारने ने भी रहमत ना बरसाई थी

तोहमत ज़माने ने जब खुदगर्जी की लगाई थी

 जब शराफत में भी हमारी

ज़माने को गुस्ताखी नजर आयी थी




हस्ती

चले थे जो हस्ती हमारी मिटाने

खाब्ब उनके सुपर्दे खाक हो गए

भरी महफ़िल में भी

जिक्र हमारा देख

वो नामवाले गुमनाम हो गए

तलाशने फिर अपनी जमीं

वो तन्हा नादान

बेआबरू हो महफ़िल से रुखसत हो गए