Sunday, October 2, 2016

पायदान

ख़त का मजमूं कुछ इस तरह मिला

पैग़ाम ए इश्क़ का इक़रार मिला

मर कर भी

शायर के जज्बातों में जिन्दा रहने का

उनको नया अंदाज़ मिला

शायराना मिज़ाज भी शायर का

भूला रश्मों रिवाजों को

तारुफ़ में उनकी ही ग़ज़ल लिखने लगा

कुछ इस तरह मशगूल हो गया शायर

शाम ए महफ़िल से रुखसत हो

मोहब्बत का अपनी इज़हार

मदिरा के छलकते जामों से करने लगा

फुर्सत ना थी अब शायर को कही

मर्ज जो दर्द का लिया

दवा उसकी खुदा को भी मालूम ना थी

धड़कने भी अब शायर की

जिन्दा रहने को

इश्क़ के रहमों कर्म की मोहताज़ थी

जिन्ने ऐ

गुलाम ए इश्क़ की

पहली पायदान थी

पहली पायदान थी

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