Wednesday, May 25, 2016

अल्फ़ाज

मशरूफ था मैं

उसे अपने अल्फ़ाज बनाने में

सँवार ना पाया लफ्ज़

मगर उसके लिए किराने से

बेकरार थे शब्द जो मेरे

लब उसके छू जाने के लिए

दफ़न रह गए वो सूनी आवाज़ बनकर

सीने में मेरे समा के 

कह ना पाया कभी उससे

शाम ए ग़ज़ल मेरी

मेरे अल्फाज़ की पहचान ही है

खन खनाती सी मीठी तेरी बोली

मशगूल रह गया मैं

लिखने में बस कवायद उसकी

ओर वो बन ना पायी कभी

दीवानी अल्फाज़ की मेरी

अल्फाज़ की मेरी 

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-05-2016) को "कहाँ गये मन के कोमल भाव" (चर्चा अंक-2355) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आदरणीय शास्त्री जी

    बहुत बहुत धन्यवाद
    आभार
    मनोज

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