Sunday, April 3, 2016

हारी बाजी

कहानी मेरी भी औरों से जुदा ना थी

शतरंज की बिसात पे जैसे जिंदगी सजी थी

एक अदना सा मोहरा था मैं उस चाल का

लगाम जिसकी थी दिग्गजों के हाथ में 

पर वर्चस्व के इस समर में

कुरुक्षेत्र की रणनीति अभी आनी थी

मगर चूक गयी गर्दन तलवार की धार से

ओर पलट दी बाजी मोहरे ने धीमी चाल से

मात खा गया बादशाह एक सिपहसालार से

छोड़ जीत के जश्न को मध्य मार्ग में

मोहरे ने फिर बैठा दिया बादशाह को तख्तों ताज पे

ओर राज हो गया मोहरे का सबके दिलों दिमाग पे

पर राजनीति के इस द्वन्द में

फिर भी मैं हार गया अपनों के हाथों जीत के

अपनों के हाथों जीत के

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-04-2016) को "कंगाल होता जनतंत्र" (चर्चा अंक-2302) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी
      आभार
      मनोज

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