Monday, December 26, 2016

हुनर

तुझसे बहुत कुछ सीखा ए जिंदगी

पर ख़ुद से जीतने का हुनर ना सीख पाया

अल्फ़ाज़ जो मेरे दर्द मेरा समटे थे

ख़ामोशी उनकी कभी समझ ना पाया

लव तब भी कुछ कहने को तरथराते जाते थे

तन्हाईयों में जब हम अपने आप से मिला करते थे

ना मेरा कोई साया था ना ही कोई प्रतिबिंब था

उजाले से फिर भी डर लगा करता था

स्याह अमावास की रात सी हर सुबह होती थी

क्योंकि किसी के छोड़ चले जाने का जिक्र

इन सुर्ख लवों पे हर पल जो मेरे संग रहा करता था

हर पल जो मेरे संग रहा करता था

Wednesday, December 21, 2016

इस पल

बिखरने दो जज़्बात

हँसने दो क़ायनात

इस पल ही सिर्फ़ जिंदगानी हैं

बाकी सब आँसुओं का खारा पानी हैं

दिल का आसमां भी

थोड़ा इतरायेगा थोड़ा मचलायेगा

पर जब खुल के बरसने लगेंगे जज़्बात

जैसे धुप सुहानी नयी रंगत लिए

छा जायेगी चहरे पर मधुर मुस्कान

उस पल को ही बस छूना हैं

जज्बातों की इस महफ़िल में

अपना खुशनुमा पल तलाशना हैं

भूला सारी क़ायनात को

बस एक इस पल को ही जीना हैं

बस एक इस पल को ही जीना हैं


Saturday, December 10, 2016

रैन बसेरा

आज फ़िर कुछ लिखने को मन हो रहा हैं

दिल अपना फ़िर से खोलने को मन हो रहा हैं 

क्यों हमसफ़र बन मिलते हैं लोग 

बिछड़ जाने को 

ग़म अपना उधार दे भूल जाने को

बंजर हो गयी मानों दिलों की जमीं

मृगतृष्णा की चाह में इसिलए

शायद लोग हद से गुजर जाते हैं

कुछ पल का रैन बसेरा कर

फ़िर दूर कही परवाज़ भर जाते हैं

ओर हौले से बंजारों की इस टोली को

अलविदा कह जाते हैं

अलविदा कह जाते हैं

आयतें

आयतें पढ़ूँ अब किसी ओर के लिए कैसे

कायनात थी वो जो इस जिंदगानी की

हारी थी दिल की बाजी उनके लिए

बदल वो रूह की तारुफ़ हमारी

ख़ुद बदल गए किसी ओर के लिए

लड़े थे जिस खुदा से इनके लिए

फ़रियाद करूँ अब उनसे कैसे

दिल ए कोई तिल्सिम का पिटारा नहीं

हर मर्ज का इलाज इसके पास भी नहीं

अब  तो बस यादों के मक़बरे पे लिखी

आयतों का ही साथ हैं

नजरें इनयातें तो सुपुर्दे ख़ाक हैं

नजरें इनयातें तो सुपुर्दे ख़ाक हैं

Thursday, November 17, 2016

दिलों का मोल

तलाशा बहुत

पर इस टूटे दिल का ख़रीदार मिला ना कोई

बिखरें आँसओं की चुभन से

भयभीत था हर कोई

हर एक पारखी नज़र वाला जोहरी था

दिलों के इस बाज़ार में

टूटे दिलों का इसलिए कोई मोल ना था

सपनों के इस बाज़ार में

फिर कोशिश की जोड़ लू इसे

फ़िर कोई एक खाब्ब से

पर मिला ना इसको भी कोई हमसफ़र

क्योंकि सब तलाश रहे थे दिलों को

अरमानों की बरसात में

अरमानों की बरसात में

Monday, November 14, 2016

मझधार

अहसास बिछड़न का जब हुआ

मायने प्यार के बदल गए

अधूरी कहानी वफ़ा की तलाश में

दिल के चौबारे में सिमट गयी

संगदिल से संजीदा हो ए मासूम

महरूम अपने आप से हो गया

मन बहलाने की शौकियां में

तसब्बुर बदल डाला उसने इस मासूम का

इश्क़ ए गुनाह भी वो कर उनके नाम

खुद इस मझधार से रुखसत हो गए

चेतना शून्य



बिछड़न का गम ऐसा था 

तन्हाई के सिवा कोई ओर पास ना था 

यादें भी सब बेवफ़ा निकली 

टूटे अरमानों से नाता उन्होंने भी तोड़ लिया 

शून्य हो गया आलम दिल का 

लील गया मंजर बिछोह उसका 

रह गया  चेतना शून्य आलम अपना 

चला गया कोई चुरा दिल इसका  

 

कब्र

बेवफ़ाई उनकी दिल को रास नहीं आयी 

बन माट्टी के पुतले

बिन जनाज़े ही जिंदगी

कब्र ए सुपर्दे ख़ाक हो आयी

कशीदें क्या पढ़ूँ टूटे दिल की शान में

आलम तन्हाई का ऐसा था

दिल की इस मज़ार पे

कोई फ़रयादी भी ना था




Tuesday, November 1, 2016

काँची

ए जिंदगी बिन धड़कन तूने जीना सीख लिया

दर्द को ही तूने धड़कन बना लिया

रूबरू ए जिंदगी तू जब काँची दिल से हुई

खो धड़कनों को जिन्दा लाश तू बन गयी

और उन बिलखती साँसों को

सजा ए ऐतबार

मौत से भी महरूम कर गयी

मौत से भी महरूम कर गयी

Friday, October 21, 2016

हसरतें

आरजू जिसकी कभी की नहीं

हसरतें जिंदगी वो कब बन गयी

दिल को ए पता ही ना चला

परिंदों सी परवाज़ भरती जिंदगानी

अटखेलियाँ करती साजों से

कब इंद्रधनुषी रंगों में रंग गयी

दिल को ए पता ही ना चला

वो चाँद कब गलहार बन

जिंदगी का हमसफ़र बन गया

दिल को ए पता ही ना चला

हसरतें जिंदगी वो कब बन गयी

दिल को ए पता ही ना चला

Saturday, October 8, 2016

अधूरी तस्वीर

तस्वीर मेरी अधूरी थी

रंगों की तेरी उसमें कमी थी

दर्पण भी नजरें चुरा लेता था

आज़माता खुद को

उसके सामने जब मैं 

फिर भी

ढूंढता फिरा हर उस सुहाने पल को 

कभी तो

रंग लूँ तस्वीर अपनी तेरे रंगों से मैं

खोया रह गया बस इसी धुन मैं

चुपके से चुरा कोई ओर ले गया

ढ़ाल तेरे रंगों को अपने रंग में

ढ़ाल तेरे रंगों को अपने रंग में

अधूरी तस्वीर

तस्वीर मेरी अधूरी थी

रंगों की तेरी उसमें कमी थी

दर्पण भी नजरें चुरा लेता था

आज़माता उसके सामने

खुद को जब में था

फिर भी

ढूंढता फिरा हर उस सुहाने पल को मैं

कभी तो

रंग लूँ तस्वीर अपनी तेरे रंगों से में

बस रह गया खोया इसी धुन मैं

ओर चुपके से चुरा कोई दीवाना ले गया

ढ़ाल तेरे रंगों को अपने रंग में

ढ़ाल तेरे रंगों को अपने रंग में

Monday, October 3, 2016

मंत्रमुग्ध

अक्षर जब मिलते हैं

शब्द बनते जाते हैं

जैसे इनको पढ़िये

वैसे अर्थ बनते जाते हैं

प्रेरणा अक्षरों को जब मिलती हैं

सुन्दर अभिव्यक्ति की रचना बन जाती हैं

भाव पढ़नेवालों के वो तब हर लेती हैं

ओर मंत्रमुग्ध हो वो

बहाव में इसकी बह जाते हैं

अक्षर जब मिलते हैं

शब्द बनते जाते हैं

Sunday, October 2, 2016

पायदान

ख़त का मजमूं कुछ इस तरह मिला

पैग़ाम ए इश्क़ का इक़रार मिला

मर कर भी

शायर के जज्बातों में जिन्दा रहने का

उनको नया अंदाज़ मिला

शायराना मिज़ाज भी शायर का

भूला रश्मों रिवाजों को

तारुफ़ में उनकी ही ग़ज़ल लिखने लगा

कुछ इस तरह मशगूल हो गया शायर

शाम ए महफ़िल से रुखसत हो

मोहब्बत का अपनी इज़हार

मदिरा के छलकते जामों से करने लगा

फुर्सत ना थी अब शायर को कही

मर्ज जो दर्द का लिया

दवा उसकी खुदा को भी मालूम ना थी

धड़कने भी अब शायर की

जिन्दा रहने को

इश्क़ के रहमों कर्म की मोहताज़ थी

जिन्ने ऐ

गुलाम ए इश्क़ की

पहली पायदान थी

पहली पायदान थी

Wednesday, September 21, 2016

आईना

आईना देखकर जीना हम सीख गए

इन आँखों में चेहरा आपका देखकर

मुस्कराना हम सीख गए

लिखी थी आयतें दिल ने जो प्यार की

रूबरू करा गयी आईना ईबादत आपकी

उम्र लंबी थी मुलाक़ात की इस शाम की

आईना रो पड़ा आपने जब आवाज़ दी

तड़प के दिल ने कहा चली आ ए मौशिकी

तोड़ के ए रश्मे चली आ गली प्यार की

क्यूँ पता आपका अब आईने से पुछूं

नूर आपका अब अपनी आँखों में पढ़ूँ

उम्र लंबी हो इस प्यार की

आईना भी मुस्करा पड़े

देख नजरें ईनायत आपकी

कदम

क़दमों का क्या गुनाह

बिन पिये ए लड़खड़ाते हैं

दो बूँद शराब की

फिर से क़दमों में घुँघरू बंध जाते हैं

नचाती हैं जब दुनिया

बिन पिये ही ए बहक जाते हैं

ओर संभलने को फिर से

मयखाने चले आते हैं

आहिस्ता ही सही

भूल रंजो गम

सुरूर में इसकी

कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं

कदम फिर से थिरकने लग जाते हैं

माया

कुदरत कैसी हैं तेरी माया

हर तरफ़ उसका ही हैं साया

क्या खबर उस दिल को

इस घरौंदे में

नशा उसका ही हैं छाया

हर मोड़ मिल जाती उसकी ही छाया

बिन कहे ही वो करीब चला हैं आया

ए खुदा कैसी तेरी हैं यह माया

दिल की इस बंजर जमीं को

तूने ही खिलखिलाना हैं सिखलाया

Tuesday, September 13, 2016

नींद

तारों भरी रात में

नींद आज फिर से दगा दे गयी

चाँद के इन्तजार में

हमें तन्हा अकेला छोड़ गयी

राह तकते तकते

मानों सदियाँ गुजर गयी

नयनों से जैसे निंदिया महरूम हो गयी

छिप गया ओझल होकर ना जाने वो कहा

निंदिया भी उसकी तलाश में

आँखों से भटक गयी

खुली पलकों में स्याह रात गुजर गयी

पर वो चाँद ना निकला

जिसके इन्तजार में रात ढल गयी

नींद आज फिर से दगा दे गयी 

Tuesday, September 6, 2016

अमृत बूँदों की मिठास

मौन क्यों हैं तू घटा आज

बरसी नहीं क्यों फिर बदरी आज

प्रचंड ताप सूर्य ने हैं दिखलाया

जल रही मरुधर की भी छाया

मच रहा हाहाकार चहुँ ओर

रुंदन कर रही धरती भी आज

बिन जल मृत्यु शैया पर लेटी हु आज

मृगतृष्णा के भँवर में

लुप्त ना हो जाए सागर कही आज

अस्तित्व ही कुदरत का

लग गया मानो दांव पे आज

इसलिए गरज बरस घटा फिर से आज

ताकि मिल जाए जीवन अस्तित्व को

अमृत बूँदों की मिठास  

अमृत बूँदों की मिठास

Monday, August 29, 2016

अजनबी कशिश

उस रूह के हम गुलाम हो गए

दिल जिससे कभी रूबरू हुआ नहीं 

कुछ ऐसी वो अजनबी कशिश थी

खाब्बों में जिसकी धुँधली सी तस्वीर थी

रंग कैसे भरता इस मौशिकी की ताबीर में

क्योँकि  मिली ना वो परछाई थी

गुलामी जिसकी सर चढ़ आयी थी

मंजर सपनों का ए बड़ा प्यारा था

दिल की फिजाओं को महकता जिसका आलम था

दीदार मगर उस रूह के अब तलक हुए नहीं

फिर ख्यालों में भी दिल 

कभी किसी ओर रूह को बेकरार हुआ नहीं

बेकरार हुआ नहीं



Saturday, August 27, 2016

जिंदगी की तलाश

चल एक बार फिर से जिंदगी की तलाश करे

तेरी खुशियों में अपनी खुशियाँ तलाश करे

दुओं की कमी ना रह जाए कही

आ मिल फिर खुदा से फरियाद करे

नजर ना लग जाए शहर की कही

दामन को तेरे गैरों से बचते बचाते चले

आ कुछ ऐसे पलों की तलाश करे

मैं और तुम से आगे निकल

हम में खुशियों की तलाश करे

चल फिर से एक बार जिंदगी की तलाश करे

एक बार फिर से जिंदगी तलाश करे

Saturday, August 13, 2016

जज्बातों की बात

सब जज्बातों की बात है

कही प्रेम तो कही कपटी चाल है 

उड़ाता मख़ौल बचपन की वो बात है 

वक़्त के साथ बदल गयी जज्बातों की बारात है 

ना अब वो चाँद महफिले शान है 

ना ही ग़ज़लों में वो रूमानी अंदाज़ है 

बस कुछ पल का याराना 

फ़िर अँधेरी रात है

सब जज्बातों की बात है

बदल गयी अब वक़्त की रफ़्तार है

खुशफ़हमी के आलम में जीने को

मजबूर आज हालात है

सब जज्बातों की बात है

Sunday, August 7, 2016

बारिस

भोर की बारिस कान में कुछ गुनगुना गयी

हौले से नींद मेरी चुरा ले गयी

मिज़ाज कुछ ऐसा आशिक़ाना बना गयी

बाँहों में उनके दीदार करा गयी

सर्द ठंडी आहों में

तड़पते दिल को बेकरार बना गयी

बदनाम थे आशिक़ हम

बारिस उसपर क़यामत बरसा गयी

हर करवटों में

सपनों की एक नयी सौगात थमा गयी

भर रूह को बदरी के आगोश में

छम छमा छम मेघ बरसा गयी

भोर की बारिस चुपके से

निंदिया चुरा ले गयी

Wednesday, July 20, 2016

लम्हा

जिन्दगी तू पलट के देखती क्यों नहीं

गुजरे लम्हों को समेटती क्यों नहीं

माना यादें वो रुलाती हैं

पर कोई लम्हा ऐसा भी था

जो सिर्फ और सिर्फ मेरा था

सिमट जाये ए यादों के पन्नों में

पहले इसके

ए जिंदगी उस पल के झरोखें से

एक बार फिर बचपन का अहसास करादे

जो लम्हा मेरा था

एक बार फिर उससे मिला दे

एक बार फिर उससे मिला दे

Monday, July 4, 2016

सफरनामा

सफ़र के इस पड़ाव में

खड़ा हूँ मुक़ाम की जिस दहलीज़ पर

राह यह आसान ना थी

मंजिल फ़िर भी मगर पास ना थी

टूटे अरमानों में साँस अभी बाकी थी

क्योंकि सफरनामे की इस गाथा में

दिलचस्प वृतांत अभी आनी बाकी थी

शायद इसीलिए

उम्मीदों की किरणों में आस अभी बाकी थी

बिखरें जज्बातों की इस कहानी में

अठखेलियाँ करते बचपन की निशानी अभी बाकी थी

वक़्त के गर्त में समा ना जाये ए अधूरी कहानी

इसलिए ताबीर जिंदगानी की अभी बाकी थी

ताबीर जिंदगानी की अभी बाकी थी
 

Thursday, June 9, 2016

साजिश

साजिश रचते रहे ता उम्र वो हमारे खिलाफ

कभी नजरों से क़त्ल की कभी दिल चुराने की

पर मेहरबाँ ना थी शायद किस्मत उनकी 

क्योंकि बदल जाती थी फितरत उनकी

मुस्कान लबों की हमारी उनको जब छू जाती थी

भूल सुध बुध स्तब्ध सी पत्थर की मूरत वो बन जाती थी

हौले से उनकी जुल्फें हिजाब जब सरका जाती थी

साजिशें रचती थी वो बड़ी हसीन मगर

हम जैसे अलबेलों को कहा वो रास आती थी

पर सच कहुँ तो

बुझी बुझी चाँदनी में भी वो महताब नजर आती थी

जो नज़रों को तो भाती थी

पर दिल में  ना उतर पाती थी

शायद इसीलिए

हमारी जीत में भी उनको हमारी हार नजर आती थी

हमारी हार नजर आती थी




Wednesday, May 25, 2016

अल्फ़ाज

मशरूफ था मैं

उसे अपने अल्फ़ाज बनाने में

सँवार ना पाया लफ्ज़

मगर उसके लिए किराने से

बेकरार थे शब्द जो मेरे

लब उसके छू जाने के लिए

दफ़न रह गए वो सूनी आवाज़ बनकर

सीने में मेरे समा के 

कह ना पाया कभी उससे

शाम ए ग़ज़ल मेरी

मेरे अल्फाज़ की पहचान ही है

खन खनाती सी मीठी तेरी बोली

मशगूल रह गया मैं

लिखने में बस कवायद उसकी

ओर वो बन ना पायी कभी

दीवानी अल्फाज़ की मेरी

अल्फाज़ की मेरी 

Friday, May 13, 2016

उधार

इश्क़ बेचने चला था

उधार में दर्द खरीद लाया

नीम हाकिम सब को दिखलाया

मगर दर्द की दवा कोई ना कर पाया

मर्ज ए इतना गहरा हो चला

साकी ने भी किनारा कर लिया

तड़प दिल से आँखों में उतर आयी

पर अश्कों की माला फिर भी मर्ज भुला ना पाई 

कहा फिर दिल ने हौले से

दर्द लिया जिससे निदान उसकी पास

रोग लिया जब इश्क़ का

दुनिया का उसमे क्या काम

करले इकरार उसकी चाहत का

दर्द तुरंत काफूर  जायेगा







Friday, May 6, 2016

गुस्ताखी

माना गुस्ताख थी जिंदगी हमारी

पर शबनम किसीके सहेजना तो गुस्ताखी ना थी

हर कतरा अनमोल था उनकी अश्कों का

क्योंकि उनके हर कतरे में एक पैगाम था

गुस्ताख दिल का करम बस इतना सा था

वो अश्कों में दुनिया भुलाते थे

और हम उसी में जन्नत तलाशते थे

पर परवरदिगारने ने भी रहमत ना बरसाई थी

तोहमत ज़माने ने जब खुदगर्जी की लगाई थी

 जब शराफत में भी हमारी

ज़माने को गुस्ताखी नजर आयी थी




हस्ती

चले थे जो हस्ती हमारी मिटाने

खाब्ब उनके सुपर्दे खाक हो गए

भरी महफ़िल में भी

जिक्र हमारा देख

वो नामवाले गुमनाम हो गए

तलाशने फिर अपनी जमीं

वो तन्हा नादान

बेआबरू हो महफ़िल से रुखसत हो गए


Sunday, April 3, 2016

हारी बाजी

कहानी मेरी भी औरों से जुदा ना थी

शतरंज की बिसात पे जैसे जिंदगी सजी थी

एक अदना सा मोहरा था मैं उस चाल का

लगाम जिसकी थी दिग्गजों के हाथ में 

पर वर्चस्व के इस समर में

कुरुक्षेत्र की रणनीति अभी आनी थी

मगर चूक गयी गर्दन तलवार की धार से

ओर पलट दी बाजी मोहरे ने धीमी चाल से

मात खा गया बादशाह एक सिपहसालार से

छोड़ जीत के जश्न को मध्य मार्ग में

मोहरे ने फिर बैठा दिया बादशाह को तख्तों ताज पे

ओर राज हो गया मोहरे का सबके दिलों दिमाग पे

पर राजनीति के इस द्वन्द में

फिर भी मैं हार गया अपनों के हाथों जीत के

अपनों के हाथों जीत के

Sunday, March 20, 2016

मर्ज़

हवा न जाने कौन सी छू गयी

मर्ज़ इश्क़ का हमको दे गयी

खिलते गुलाब सा मुखड़ा

जैसे सौगात में दे गयी

जालिम बदल फ़िर फिजाँ की बयार

रुख से नक़ाब उड़ा ले गयी

ओर जाते जाते , दिल के चमन में

जन्नत बसा गयी

ना आया जिसे कभी इश्क़ करना

उसे इश्क़ की वादियों में तन्हा छोड़ गयी

हवा न जाने कौन सी छू गयी

मर्ज़ इश्क़ का हमको दे गयी

हवा न जाने कौन सी छू गयी

Thursday, March 3, 2016

लफ्ज़

अधरों को मेरे लफ्ज़ अगर मिल जाते

करने हर खाब्ब को सच

पर लगा के वो उड़ जाते

ठहर ना पाती बात इसी तलक

क्योंकि, सितारों की महफ़िल से निकल वो

करीब चाँद के चले आते

आरजू जो थी दिल की

हसरतें वयां करने की

तम्मना पूरी वो कर पाते

तुम मानो  या ना मानो

रुखसत तेरे दिल से फिर कैसे हो पाते

अधरों को मेरे जो लफ्ज़ मिल जाते

अधरों को मेरे जो लफ्ज़ मिल जाते

Wednesday, March 2, 2016

कोहराम

बड़ी मनहूस थी वो रात

छूट गया जब तेरा मेरा साथ

बदलते हालातों की थी ए आग

भस्म हो गयी जिसमें रिश्तों की बुनियाद

गुम हो गयी वो थी प्यार की पुकार

रह गयी थी सिर्फ सिसकियों की आवाज़

बसने से पहले उजड़ गयी आशियाने की दीवार

रह गया खंडहर याद दिलाने उस रात का कोहराम 


Sunday, February 14, 2016

जीना

तू गुज़रे कल की बात ना कर

आने वाले कल की बात कर

सँवर जाएगा मुकद्दर

वक़्त को हमसफ़र बना के चल

तस्वीर फ़िर रंग जायेगी

महफ़िल क़ामयाबी की जब सज जायेगी

माना जो गुज़र गया वो अपना ना था

पर आनेवाला जो सपना था

वही एक पल तो अपना था

क़वायद इसलिए जिंदगी की तू सीख ले

कल के बदले आज में जीना सीख ले

सुरा के रंग

बात जो मदिरालय की पुकार में

ना वो मस्जिद की अजान में

ना वो मंदिर के भगवान में

छू लेती है दिल को इसकी जो बात

यहाँ नहीं कोई महजब की दीवार

एक ही किश्ती के यहाँ सब खैवन्हार

छलकाती है जब ए जाम

जन्नत उत्तर आती हैं तब धरा के पास

थामी जिसने भी इसकी पतवार

खुद वो खुदा बन गया

सुरा के रंग समाय

सुरा के रंग समाय

Friday, January 22, 2016

किश्तों में जिंदगी

किश्तों में जिंदगी जीना हमने छोड़ दी

लकीरें हाथों की हमनें मोड़ दी

देख जज्बे को

ख़फ़ा रहने वाली क़िस्मत भी खिलखिला उठी

फ़ैसला मुक़दर का अपने था

धारा जिंदगी की हमने मोड़ दी

वंचित रह न जाए जिंदगानी कही

फ़िज़ों में खुशबू हमने बिखेर दी

झुक गया आसमां भी

जिन्दा रहने की क़वायद जब हमने सीख ली

किश्तों में जिंदगी जीना हमने छोड़ दी

लकीरें हाथों की हमनें मोड़ दी

किश्तों में जिंदगी जीना हमने छोड़ दी






राह

चला था अकेला जिस नयी राह पर

मुसाफ़िर तो यूँ अनेक मिले उस राह पर

हमसफ़र कोई मिला नहीं मगर उस राह पर

गुजरती घड़ियाँ जैसे सादिया बन गयी

वक़्त जैसे ठहर गया उस राह पर आके

भूलभुलैया थी पगडंडियों की उस राह के आगे

कदम रुक गए उस राह पे आके

दिशाहीन हो भटक गया उस राह के आगे

नामों निशां ना था मंजिल का उस राह के आगे

कशमकश की इस राह पे आके

अब तो यह भी भूल गया जाना किस राह के आगे

अब तो यह भी भूल गया जाना किस राह के आगे 


सुर्खियाँ

सुर्खियाँ बटोरीं थी हमने

बदनामी के ताल में

साजिश रची थी उस गुमनाम ने

मोहब्बत के जाल में

सुध बुध खो बह गया था

प्यार की धार में

सपनें बड़े ही हसीन थे

पर छोड़ चले गए थे

किसी ओर के साथ में

छोड़ बेहाल हमें अपने हाल पे

थाम लिया था बेवफ़ा ने दामन

किसी ओर के साथ में

किसी ओर के साथ में

Thursday, January 21, 2016

अधूरी कहानी

हर जिंदगानी की एक अधूरी कहानी है

कुछ कही कुछ अनकही  सी कहानी है

कोई दिल के करीब तो कोई दिल से दूर

क्षिलमिलाते तारों सी कहानी है

बेक़रार हर दिल अज़ीज़ फिर भी  है

मिलने किसी नए मोड पर

कहानी जो रुखसत हुई थी

छोड़ बंदगी किसी अनजाने मोड़ पर

भर ना पाये रंग अब कशिश के कभी

प्यासी लफ्जों सी दिल की ए कहानी है

कहानी अधूरी भले ही वह सही

साया उस बानगी को मगर साथ आज भी है

हर जिंदगानी की एक अधूरी कहानी है

कुछ कही कुछ अनकही  सी कहानी है

हर जिंदगानी की एक अधूरी कहानी है

हर जिंदगानी की एक अधूरी कहानी है