Wednesday, November 11, 2015

अकेला

जमघट था यारों का

मगर अकेला खड़ा था तन्हाई में

गुम थी परछाई भी

अकेला खड़ा लड़ रहा था तन्हाई से

खामोश हो चुकी थी जुबाँ भी

पथरा गयी थी आँखें भी

लफ्ज कोई मिल नहीं रहे थे

लव जैसे खुल नहीं रहे थे

इस पल संग किसीका ना था

नजारा कुछ ऐसा था

सब कुछ होते हुए भी

पास अपने कुछ ना था

पास अपने कुछ ना था

चाहत तेरी

जो तू ग़ज़ल ना होती मेरी

शायद मैं भी तब शायर ना होता

अंदाज़ ए शोखियों पे तेरी

कलमा कोई ना पढ़ रहा होता

रूह जो तू ना होती इस शायर की

ख़लिश शायरी मुक़म्मल ना होती

मिली जब से जिंदगानी तेरी

इबादत बन गयी तू मेरी

कबूल हो गयी जैसे फ़रियाद कोई

शायद इसिलये

खुदा बन गयी चाहत तेरी

खुदा बन गयी चाहत तेरी