Thursday, February 12, 2015

अन्धकार

प्यार की तड़प में नयनों से जब अश्रु धारा बहती है

लहू भी तब सिरहन जाता है

अन्तर्मन से निकली यह वेदना

जब करती है

चितत्कार के पुकार

करुण धारा भी बन जाती है तब प्रलय तूफ़ान

उजड़ जाता है मानो जैसे सारा संसार

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार   

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार

Sunday, February 8, 2015

फ़ासले

आज मैं अपनी दुनिया लूटा रहा हुँ

दिल अपना किसी ओर के नाम लिख रहा हुँ

वो दिलों के पास होके भी नजरों से दूर है

ओर मैं उनकी नजरों में होके भी

उनकी धड़कनों से दूर हुँ

तन्हाई भरे इन फ़ासलों के इस दरमियाँ

उनकी यादों में खुद को भूला रहा हुँ

आज मैं अपनी दुनिया लूटा रहा हुँ