Tuesday, August 4, 2015

तपिश

वो सावन की बहार थी

मेघों की बारात थी

घटाओं  की वयार थी

तक़दीर कुछ इस तरह मेहरबाँ थी

मानों हर तरफ रिमझिम सी सौगात थी

नजरों की दुनिया भी कुछ इस तरह इनायत थी

हर ओर बारिसों की फ़ुहार थी

मानों इस पल ही जिंदगी गुलज़ार थी

वरना तो रेगिस्तान की तपिश थी

वरना तो रेगिस्तान की तपिश थी

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