Friday, July 24, 2015

नयी चेतना

आवेग हूँ मैं ऐसी

बाँध सके ना जिसे कोय

मझधार से मेरी जो मिले

जुदा ना फ़िर मुझ से होय

जुदा ना फ़िर मुझ से होय

उफ़ान हूँ चरम पे

प्रपात में लिए घनघोर शोर

प्रपात में लिए घनघोर शोर

फ़िर भी

शीतल निर्मल प्रवाह हूँ मैं

स्पर्श आलिंगन से मेरी

नयी चेतना की अनुभूति होय

नयी चेतना की अनुभूति होय 

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-06-2015) को "व्यापम और डीमेट घोटाले का डरावना सच" {चर्चा अंक-2048} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय शास्त्री जी

      मेरी कविता को अपने चर्चा मंच पे स्थान दे हौसला अफजाई के मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ I
      सादर
      मनोज

      Delete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-06-2015) को "व्यापम और डीमेट घोटाले का डरावना सच" {चर्चा अंक-2048} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  3. आदरणीय शास्त्री जी

    मेरी कविता को अपने चर्चा मंच पे स्थान दे हौसला अफजाई के मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ I
    सादर
    मनोज

    ReplyDelete