Friday, July 17, 2015

मोड़

वो मोड़ कुछ ओर था

ये मोड़ कुछ ओर है

तू खाब्बों की ताबीर थी

मैं गुनाहों की तस्वीर था

फ़ासलों के इस दरमियाँ भी

डोर कोई अनजानी बँधी थी

पर इस मुक़ाम को

मंजिल की कहा सौगात थी

तस्वीर के इस पहलू  को

रंगों से जैसे कोई नाराजगी थी

मानों खफा हो दिल की वादियाँ

अधूरी साँसों में

धड़कने टटोल रही थी

साक्षी थी जो वफ़ा की

बानगी उसकी तलाश रही थी

पर उजड़ चुका था घरौंदा

मगर दिल को ये खबर तक ना थी

मगर दिल को ये खबर तक ना थी

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