Monday, December 21, 2015

जिज्ञासा

ए दोस्तों

खुदा मिले अगर तुम्हें कहीं

तो मुझको भी बतला देना तुम

मन्दिर मस्जिद हर जगह तलाशा उसे

यहाँ तलक दिल में भी तलाशा उसे

पर अहसास वजूद के भी

उसके हो ना सका

मगर फिर भी

एक बार मिलना उससे है जरुरी

उनसुलझे सवाल

कचोट जेहेन को जो रहे

हिसाब उनके लेने हैं जरुरी

पर लगता है निरुतर है वो भी

शायद इसलिए नजरें चुरा 

मिलने से मुझसे घबरा रहा वो कही

जिज्ञासा मेरी

उसके होने ना होने में नहीं

अस्तित्व की तलाश है ए मेरी

सवाल जो पहेली बन गये

उतर के उनकी तलाश है मेरी

ए  दोस्तों इसलिये

मेहरबानी इतनी करना मुझ पर तुम

अगर मिले खुदा तुम्हें कहीं

पैग़ाम मेरा उसको ए दे देना तुम

तलाश में उसकी भटक रहा कोई

बतला उसको ए देना तुम

ए दोस्तों

मिले खुदा अगर तुम्हें कहीं

बतला मुझको भी देना तुम

बतला मुझको भी देना तुम  

Tuesday, December 15, 2015

व्यभिचार

वक़्त ने जैसे किनारा कर लिया

परवाज़ भरने से पहले

दरिंदों ने जकड़ लिया

और पर कटे लहूलुहान परिंदों सा

मरने को छोड़ दिया

एक मासूम कली को

फूल बनने से पहले रौंद दिया

व्यभिचार की इस चरम सीमा ने

मानव से मानव कहलाने का हक़ छीन लिया

घिनौनें कृत की पाश्वता ने

खोख का हरण कर

रावण को भी लज्जा दिया

जलने के लिया मानो कायनात को 

लाख का महल बना दिया।

Friday, December 11, 2015

वो लह्मा

वो लह्मा मेरा ना था

नाता मेरा तुझसे कोई ना था

पर रुखसत जो तू हुईं

मोहल्ला वो अब गँवारा ना था

मगर यादों का जो बसेरा था

फिर भी खाब्ब तेरे ही संजोता था

रास जिंदगी को

पल यह ना आया था

ओर कह अलविदा तेरे शहर को

तलाशने रूह अपनी

कदम नयी मंजिल को बढ़ाया था

पर दिल को कोई ना भाया था

क्योंकि हर अक्स में 

तेरा ही नूर नज़र आया था

तेरा ही नूर नज़र आया था


Wednesday, November 11, 2015

अकेला

जमघट था यारों का

मगर अकेला खड़ा था तन्हाई में

गुम थी परछाई भी

अकेला खड़ा लड़ रहा था तन्हाई से

खामोश हो चुकी थी जुबाँ भी

पथरा गयी थी आँखें भी

लफ्ज कोई मिल नहीं रहे थे

लव जैसे खुल नहीं रहे थे

इस पल संग किसीका ना था

नजारा कुछ ऐसा था

सब कुछ होते हुए भी

पास अपने कुछ ना था

पास अपने कुछ ना था

चाहत तेरी

जो तू ग़ज़ल ना होती मेरी

शायद मैं भी तब शायर ना होता

अंदाज़ ए शोखियों पे तेरी

कलमा कोई ना पढ़ रहा होता

रूह जो तू ना होती इस शायर की

ख़लिश शायरी मुक़म्मल ना होती

मिली जब से जिंदगानी तेरी

इबादत बन गयी तू मेरी

कबूल हो गयी जैसे फ़रियाद कोई

शायद इसिलये

खुदा बन गयी चाहत तेरी

खुदा बन गयी चाहत तेरी

Sunday, October 11, 2015

दीवार

ये गम तू कुछ इस तरह मुस्करा

बबंडर

ग़मों की आँधियों के

मंजिल अपनी भटक जाए

और खिलखिलाती धूप भी

सौगात में

आँसुओ की ताबीर लिए चली आए

माना मुश्किल बड़ा ही यह इम्तिहान

पर छोड़ दिया जो कफ़न एक बार

बिन जनाजे ही

दफ़न हो जायेंगे सारे गम गुब्बार

ले आयेगा सकून

आँसुओं की फुहार

और बहा ले जायेगा संग अपने

हर रंजो गम की दीवार

Tuesday, September 22, 2015

ख़ौफ़

मैं पानी पे नाम उसका लिखता रहा

वो रेत के महल बनाती रहीं

सपनों की इस डोर को

लहरों का ख़ौफ़ ना था

रिश्तों की इस माला को

बिखरते घरोंदों का रंज ना था

थी बस एक ही लगन

चाहे उजड़ते रहे आशियाँ

मिटते रहे नामोनिशां

मगर सपनें आँखों में

यूँ ही बस पलते रहे

ओर सपनें बस यूँ ही पलते रहे




Saturday, September 19, 2015

अधूरा मिलन

तराशा था जिसे खाब्बों में

तलाशता फिरा उसे फिर ज़माने में

पर मिला ना कोई ऐसा अब तलक इस जमाने में

रंग भर दे जो उस मूर्त में

तराशी थी जिसकी सूरत खाब्बों में

यूँ तो सितारें अनेक मिले राहों में

पर चाँद वो नजर ना आया

तराशा था जिसे खाब्बों में

माना हुस्न की कमी ना थी ज़माने में

मगर वो ना मिली

तस्वीर जिसकी बसी थी आँखों में

गुनाह यह दिल का था या आँखों का

गुमान इसका ना था

पर चाहत का यह कैसा अहसास था

अरमानों से तराशा था जिसे

रंग उसके

आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में

आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में
  














Tuesday, September 8, 2015

दर्द से नाता

दर्द से मेरा गहरा नाता हैं

वफ़ा कोई इससे सीखे

हर बातों में जीसने

हँसी को रुलाया हैं

दर्द से मेरा गहरा नाता हैं

साये ने इसके

ऐसा मुझको घेरा हैं

अँगार जो दिल में हैं

तूफ़ान जो जज्बातों में हैं

सात जन्मों का

नाता जैसे उनसे जोड़ा हैं

हर कदम जैसे

मोहब्बत बन गयी यह मेरी

ऐसा दर्द से मेरा गहरा नाता हैं

पराया दिल

मुझे ए मालूम था

दिल अपना पराया था

फिर भी इश्क़ इससे लगाया था

खबर ना  हो किसीको

साँसों को इसलिए

हमराज बनाया था

धड़कनें जो तब गुनगुनाती थी

खाब्ब हसीन उनकों भी दिखलाया था 

मुझे ए मालूम था

दिल अपना पराया था

फ़िर भी खुद को ए समझाया था

जीना बिन इसके गँवारा ना था

रिश्ता मोहब्बत का

इससे कुछ ऐसा बनाया था

जब मुझे ए मालूम था

दिल अपना पराया था

फिर भी इश्क़ इससे लगाया था

Wednesday, September 2, 2015

अंदाज़

बदल जाती है फ़िज़ाओं की राग

शायराना होता हैं जब अंदाज़

व्यार जो फ़िर  बहती हैं

निखार इंद्रधनुषी घटा सा लिए आती हैं

हर एक कलमा जैसे संग अपने

रंगों की ताबीर लिए आती हैं

जैसे बिन सुर बिन ताल ही

सप्त सुरों की रागिनी

मधुर तान लिए आती हैं

ओर फिर

बदल जाती है फ़िज़ाओं की राग

शायराना होता हैं जब अंदाज़

गीत

उमड़ घुमड़ घटा सुना रही

सावन के गीत

दामन में भर अपने नीर

उड़ चला गगन

बरसाने मेघों के तीर

स्वागत करने बदरी को

छटा बिखेर रही किरणें

बना इंद्रधनुषी तोरण धीर

उमड़ घुमड़ घटा सुना रही

सावन के गीत

Saturday, August 29, 2015

एकांत

पलट कर जब देखता हूँ

तुझे ए जिंदगी

कुछ मीठे कुछ खट्टे

अहसास की यादें फिर से

तरोताजा हो जाती हैं

कभी फ़लक के आसमाँ की

कभी काँटो भरी राहों की 

वो किस्से कहानियाँ

बरबस ही दिल को छू जाती हैं

उम्र के उस मोड़ पर

बदलते सफ़र के मोड़ पर

हवाएँ भी रुख बदल जाती थी

बदलाव की यह वयार

दिल को बेबजह बदनाम कर जाती थी

ओर आलम उस पल कुछ ऐसा होता था

जिंदगी जीने के सिवा

पास कुछ ओर ना होता था

मगर सफ़र के इस मुक़ाम को

जिंदगी मेरा भी

प्यार भरा सलाम था

अब तो बस ठंडी आहें

गुजरी यादें लिए आती हैं

एकांत में

जिंदगी जब तू मुझसे मिलने आती हैं

एकांत में

जिंदगी जब तू मुझसे मिलने आती हैं

Tuesday, August 4, 2015

तपिश

वो सावन की बहार थी

मेघों की बारात थी

घटाओं  की वयार थी

तक़दीर कुछ इस तरह मेहरबाँ थी

मानों हर तरफ रिमझिम सी सौगात थी

नजरों की दुनिया भी कुछ इस तरह इनायत थी

हर ओर बारिसों की फ़ुहार थी

मानों इस पल ही जिंदगी गुलज़ार थी

वरना तो रेगिस्तान की तपिश थी

वरना तो रेगिस्तान की तपिश थी

Thursday, July 30, 2015

परिवर्तन

परिवर्तन हैं प्रकृति का रूप

हर रात के बाद हैं

सुबह की धूप

बदलते मौसम के संग

अँगारे बन जाते हैं फूल

ना ही कोई अमर हैं

ना हैं कोई सास्वत

कुदरत का यही हैं उसूल

पन्नों में जिंदगी

जिंदगी में काँटो की सूल

प्रकृति का यही है स्वरूप

परिवर्तन हैं प्रकृति का रूप

परिवर्तन हैं प्रकृति का रूप

Friday, July 24, 2015

नयी चेतना

आवेग हूँ मैं ऐसी

बाँध सके ना जिसे कोय

मझधार से मेरी जो मिले

जुदा ना फ़िर मुझ से होय

जुदा ना फ़िर मुझ से होय

उफ़ान हूँ चरम पे

प्रपात में लिए घनघोर शोर

प्रपात में लिए घनघोर शोर

फ़िर भी

शीतल निर्मल प्रवाह हूँ मैं

स्पर्श आलिंगन से मेरी

नयी चेतना की अनुभूति होय

नयी चेतना की अनुभूति होय 

एक नई कहानी

दिल जब कभी उदास होता हैं

एक नई कहानी वयां करता हैं

दर्द में डूबी दास्ताँ को

आंसुओं का आसरा देता हैं

दिल जब कभी उदास होता हैं

एक नई कहानी वयां करता हैं

लहूलुहान जिंदगानी के ताने बाने में

फिर से जिन्दगी तलाश करता है

दिल जब कभी उदास होता हैं

एक नई कहानी वयां करता हैं

नफ़रत की इस पटककथा में भी

प्यार के बीज पिरतों हैं

दिल जब कभी उदास होता हैं

एक नई कहानी वयां करता हैं



Friday, July 17, 2015

अधरों पे

अधरों पे नाम तेरा

आते आते रुक जाता है

जलती है जब शमा

परवाना मचल जाता है

अधरों पे नाम तेरा

आते आते रुक जाता है

झुक जाती है नजरें

नूर तेरा जब नजर आता है

अधरों पे नाम तेरा

आते आते रुक जाता है

थम जाती है साँसे

हिजाब तेरा जब सरक जाता है

अधरों पे नाम तेरा

आते आते रुक जाता है

मोड़

वो मोड़ कुछ ओर था

ये मोड़ कुछ ओर है

तू खाब्बों की ताबीर थी

मैं गुनाहों की तस्वीर था

फ़ासलों के इस दरमियाँ भी

डोर कोई अनजानी बँधी थी

पर इस मुक़ाम को

मंजिल की कहा सौगात थी

तस्वीर के इस पहलू  को

रंगों से जैसे कोई नाराजगी थी

मानों खफा हो दिल की वादियाँ

अधूरी साँसों में

धड़कने टटोल रही थी

साक्षी थी जो वफ़ा की

बानगी उसकी तलाश रही थी

पर उजड़ चुका था घरौंदा

मगर दिल को ये खबर तक ना थी

मगर दिल को ये खबर तक ना थी

Tuesday, June 16, 2015

वात्सल्य

वात्सल्य की ख़ोज में

निकला हुँ अनजानी मोड़ पे

छू ले कोई मर्मस्पर्शी चेतना आख़िर

स्पंदन से जिसके जग जाए

वात्सलय भावना सारी

ना कोई वेदना हो

ना कोई संवेदना हो

सिर्फ़ वात्सलय का आगाज़ हो

आवेग में जिसकी

रूह को सुकून का अहसास हो

इंद्रधनुषी रंगो से सुसज्जित

वात्सलय की इस अनुभूति में

आत्मा से परमात्मा एकाकार हो

आत्मा से परमात्मा एकाकार हो

Friday, May 15, 2015

जुगलबंदी

जुगलबंदी जब मेरी तेरी होगी

प्यार के तरानों की

स्वर लहरियाँ तब गूँजेगी

दिलों की इस जुगलबंदी में

सिर्फ प्रेम गीतों की लड़ियाँ होगी

संगम ऐसा होगा

जैसे स्वर और ताल की कड़ियाँ होगी

मैं और तुम से हम की सुन्दर रचना होगी

एकाकार सरगम की जैसे

सुहानी रिमझिम बरसात होगी

जुगलबंदी जब मेरी तेरी होगी

प्यार के तरानों की

स्वर लहरियाँ तब गूँजेगी

स्वर लहरियाँ तब गूँजेगी

प्रेम

प्रेम एक अनुभूति हैं

दो आत्माओं के मिलन की जननी हैं

रंग भरे इसमें सारे व्रह्माण्ड के

सृष्टि की यह जननी हैं

अदृस्य चेतना की यह

मर्मस्पर्शी अनुभूति हैं

पिरों बंधन को

झुका दे कायनात सारी

यह वो अनजानी शक्ति हैं

प्रेम अहसास ही जीवन मुक्ति हैं

कण कण में बसती इसके यह हस्ती हैं

छू लिया जिसने इस विधान को

प्रेम रूप की वो मूर्ति हैं

प्रेम रूप की वो मूर्ति हैं

Friday, May 8, 2015

ख़ामोशी

तन्हाई को आवाज़  दू तो

शब्दों के घुँघरू बिखर जाते हैं 

एक परछाई की तम्मना में

लब्ज़ ख़ामोश हो जाते हैं

गुजरती क्या हैं इस दिल पे

ये ना पूछों यारों

एक एक पल जैसे

एक सदी बन जाती हैं

खुदगर्ज़ी के आलाम में जैसे

जिंदगी सिमट जाती हैं

ओर इन फ़ासलों के दरमियाँ

ख़ामोशी घऱ अपना बना लेती हैं

घऱ अपना बना लेती हैं 

पनाह

आरजू मोहब्बत से की

रुसवा ज़माने ने ने कर दिया

रंजो गम की दास्ताँ को

साकी भी भुला ना सकी

खामोश लबों के दर्द को

साकी भी बयां ना कर सकी

सिसकते अरमानों  को

मोहब्बत के घरौंदे में

पनाह दिला ना सकी

पनाह दिला ना सकी

उल्फ़त

बड़ी उल्फ़त है इस ज़माने में

साया भी साथ नहीं देता

इस खुदगर्ज़ ज़माने में

नासिर भी नहीं होती नजरें

मेहरबाँ हो जाए ताकि तक़दीर अपनी

और टूट जाए बंदिशों के ताले

Thursday, April 2, 2015

नाता

अरमानों को लफ्ज़ दू तो

दिल रोता है

पर मुस्कराके नये सपनें फिर बुनता है

इल्म नहीं मुझे इसके रोने का

इसलिये हर लफ्जों में जज्बात पिरोता हुँ

अरमानों की डोली

दुःखों की सेज पे भी हसीन बने

इसलिये पाने बचपन को फिर से

पल पल मचलता हुँ

हर रंगों की एक नयी कहानी हो

हर लफ्जों की एक नयी जुबानी हो

इसी कशमश में

सपनों से दूर चला जाता हुँ

पर खाब्ब की कशिश से

नाता तोड़ नहीं पाता हुँ

नाता तोड़ नहीं पाता हुँ

Tuesday, March 3, 2015

मेरी बिटिया

खुदा  का नूर है तू

मेरी बगियाँ का फूल है तू

सागर सी चंचल है तू

मेरे आँगन की शोभा है तू

राधा की मूरत है तू

इनसे बढ़कर

मेरा गरूर है तू

और

कभी रंगो में रंगी

कभी रागों में सजी

मेरी राग रागिनी है तू

मेरी बिटिया रागिनी है तू

Monday, March 2, 2015

खबर

खबर ना तेरे आने की थी

ना जाने की थी

हम तो आहटों पे

कान लगाये बैठे थे

पदचाप की पर ना कोई सरसराहट थी

सुनने तेरी आहट को

धड़कनें भी खामोश थी

दस्तक तू दे जाये इस दिल में

दुआ खुदा से बस इतनी थी

जिनकी हर अदाओं में कुदरत बरसे

वो कायनात मेरी आरजू थी

साहिल के करीब मंज़िल थी

पर प्यार की कस्ती अब भी कोशों दूर थी

क्योंकि इस दिल को

अब तलक तेरी कोई ना खबर थी

तेरी कोई ना खबर थी

आरजू

आरजू बस इतनी सी है की

हर पल रंग बदलती आरजूओं की

आरजू बस अब ओर नहीं

सुलगते अरमानों के शोलों से

जलने की आरजू ओर नहीं

चाहत की चाह में लूटने की

आरजू अब ओर नहीं

नयनों से नयनों के मिलन की

आरजू अब ओर नहीं

चंदा की चाँदनी को खोने की

आरजू अब ओर  नहीं

क्योंकि प्यार भरे दिल

के घरौंदे से निकलने की

आरजू कभी नहीं

इसलिए आरजू बस इतनी सी है

हर पल रंग बदलती आरजुओं की

आरजू बस ओर नहीं

Thursday, February 12, 2015

अन्धकार

प्यार की तड़प में नयनों से जब अश्रु धारा बहती है

लहू भी तब सिरहन जाता है

अन्तर्मन से निकली यह वेदना

जब करती है

चितत्कार के पुकार

करुण धारा भी बन जाती है तब प्रलय तूफ़ान

उजड़ जाता है मानो जैसे सारा संसार

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार   

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार

Sunday, February 8, 2015

फ़ासले

आज मैं अपनी दुनिया लूटा रहा हुँ

दिल अपना किसी ओर के नाम लिख रहा हुँ

वो दिलों के पास होके भी नजरों से दूर है

ओर मैं उनकी नजरों में होके भी

उनकी धड़कनों से दूर हुँ

तन्हाई भरे इन फ़ासलों के इस दरमियाँ

उनकी यादों में खुद को भूला रहा हुँ

आज मैं अपनी दुनिया लूटा रहा हुँ  

Monday, January 19, 2015

ऊँची उड़ान

अधखुली पलकों के खाब्ब अभी बाकी है

क्योंकि  सपनों की ऊँची उड़ान अभी बाकी है

स्वछंद विचरण करुँ परिंदो की तरह

उड़ता फिरुँ गगन भर

डोर इस खाब्ब की थामनी अभी बाकी है

छूने मंजिल को आतुर

सपनों का संसार अभी बाकी है

खाब्बों के इस तिलसिम के

कई अधखुले राज अभी बाकी है

कई अधखुले राज अभी बाकी है

अधखुली पलकों के खाब्ब अभी बाकी है

क्योंकि  सपनों की ऊँची उड़ान अभी बाकी है

Monday, January 12, 2015

खोए पल

अक्सर हम कुछ लहमों  को जीते है

जवानी के कदमों में

बचपन की मासूमियत खोते है

दूर हो जाती है जिंदगी

अहसास जब तलक खोए पलों का होता है

खालीपन जब कचोटने लगता है

मुड़ कर देखना भी

नागवारा लगता है

क्योंकि हिसाब उन पलों का

आज भी आधा ही नजर आता है

आधा ही नजर आता है  

जात

मदमाती पवन की वेगों से

उनकी चाल ना पूछो

लह लहाती लहरों की वेगों से

उनकी धार ना पूछो

कब रुख बदल ले

कुदरत का यह करिश्मा

इससे इसकी जात ना पूछो

इससे इसकी जात ना पूछो

मोहब्बत की महक

उनकी नफ़रत से भी

मोहब्बत की महक आती है

कैसी ना जाने ये लगी है

ज़ालिम बददुआ भी दुआ नज़र आती है

ख़ामोश लबों से भी

लफ्जों की झलक आती है

घूँघट के झरोखों से भी

क़ातिल नजरें नज़र आती है

कफ़न के टूकड़े से भी

आँचल की झलक आती है

उनकी नफरत से भी

मोहब्बत की महक आती है