Sunday, May 18, 2014

पीनेवालों का महजब

ये दुनियावालों

हम पीनेवालों का महजब ना पूछो

साकी की जात ना पूछो

मयख़ाने की गलियों की बहार ना पूछो

छलकते जामों की लय ताल ना पूछो

भुला दे जो हर गम

लगा लबों से अपने

उस मदिरा की चाल ना पूछो

डूब जाए जिसकी मदहोशी के आलम में

पूछो तो बस उस साकी के घर का पता पूछो

उस साकी के घर का पता पूछो

Monday, May 5, 2014

पराया

कल तक  जो शहर अपना लगता था

शहर वो आज पराया  लगता है

रूह थी तू जिसकी

तेरे चले जाने से

शहर वो बेगाना सा लगता है

बसते थे जज्बात जहां

वो शहर अब सैलाब का दरिया लगता है

चमन था जो तेरे हुस्न से

वो शहर आज उजड़ा वीरान लगता है

कल तक  जो शहर अपना लगता था

शहर वो आज पराया  लगता है

रूह थी तू जिसकी

तेरे चले जाने से

शहर वो बेगाना सा लगता है

कल तक  जो शहर अपना लगता था

शहर वो आज पराया  लगता है