Monday, May 5, 2014

पराया

कल तक  जो शहर अपना लगता था

शहर वो आज पराया  लगता है

रूह थी तू जिसकी

तेरे चले जाने से

शहर वो बेगाना सा लगता है

बसते थे जज्बात जहां

वो शहर अब सैलाब का दरिया लगता है

चमन था जो तेरे हुस्न से

वो शहर आज उजड़ा वीरान लगता है

कल तक  जो शहर अपना लगता था

शहर वो आज पराया  लगता है

रूह थी तू जिसकी

तेरे चले जाने से

शहर वो बेगाना सा लगता है

कल तक  जो शहर अपना लगता था

शहर वो आज पराया  लगता है

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (07-05-2014) को "फ़ुर्सत में कहां हूं मैं" (चर्चा मंच-1605) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बसते थे जज्बात जहां

    वो शहर अब सैलाब का दरिया लगता है
    एक व्यक्ति के जाने के बाद क्या हो जाता है खुद को?
    सुन्दर

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