Wednesday, April 2, 2014

पितृ रस की गाथा

पितृ सुख से बड़ा ना सुख कोई

परछाई बन साये तले जिसके

पायी जिसने छत्र छाया इसकी

प्रखर बन गयी जिन्दगानी उसकी

प्रेरणा मान अभिमान से

पकड़ी उंगली जिसने पितृ कि

प्रेम सुधा फिर बन गयी

स्नेह भरी

पितृ रस कि वह मधुर गाथा

पितृ रस कि वह मधुर गाथा

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