Sunday, February 9, 2014

भवँर

उजाले में रोशनी कि कवायद थी

पर यहाँ उजाले में भी

अंधरे कि सुगबुगाहट थी

वो मर्मस्पर्शी चेतना मानो

चेतना शून्य हो भटक रही थी

मुश्किल इस डगर कि राह मानो

चमत्कारिक उजियारे कि बाट जोह रही थी

अहंकार के अंधियारे में

जैसे रोशनी कि कोई बिसात ना थी

प्रकाश कि किरणें भी जैसे

सहमी सहमी नजर आ रही थी

भवँर था यह ऐसा

खुदगर्जी के आगे राह नजर आ नहीं रही थी

उजाले से रोशनी कि कवायद थी

पर यहाँ उजाले में भी

अंधरे कि सुगबुगाहट थी

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (11-02-2014) को "साथी व्यस्त हैं तो क्या हुआ?" (चर्चा मंच-1520) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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