Saturday, February 1, 2014

आधे अधूरे से खाब्ब

नींद न जाने कहाँ खो गयी

जिंदगी सपनों कि दुनिया से बेजार हो गयी

खाब्ब अब आधे अधूरे से रह गए

नज़ारे सारे

नयनों के सामने सिमट गए

रोग ए कैसा लगा

बोझिल पलकें भी

जैसे करवटों में बदल गयी

ओर सुहानी रात कि घड़ियाँ

तारें गिनते हुए गुजर गयी

तारें गिनते हुए गुजर गयी

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (03-02-2014) को "तत्काल चर्चा-आपके लिए" (चर्चा मंच-1512) पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. महोदय हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया

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  2. Replies
    1. मेरे ब्लॉग से जुड़ने कि लिए धन्यवाद . आप कि हौसला अफजाई से मेरे कलम में ओर निखार आ जाये .

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