Tuesday, March 26, 2013

रूप लावण्य

अधरों पे फिर वो ही गीत सजा रखना

शबनमी अधखुली पलकों से

मदहोशी का आलम छलका देना

जब हम आये तो

बाहों में भर सुला देना

भूल जाए कायनात सारी

आगोश में तेरी

प्यार की वो मधुर राग गुनगुना देना

ढल ना पाए ये पहर कभी

अपने रूप लावण्य बाँध इसे लेना

बाँध इसे लेना

खाब्ब कुछ इस तरह तुम सजा देना

अधरों पे फिर वो ही गीत सजा रखना

लगाव

रंगों से हुआ ऐसा लगाव

रंगों की चाहत ने दुनिया ही बदल डाली

रंगरेज हो अनुभूति सारी

रंगीन बना डाली तस्वीर पुरानी

रंगीन हो गयी उजली उजली हर शाम सुहानी

रंगों के रंग रंग गयी जैसे

कोई साज पुरानी

रंगों की रंगीनी में खो

रंगीन मिजाज हो गयी चक्षु बेचारी

रंग ही रंग दिखे अब हर तरफ

छिटक रही जैसे रंगों से चाँदनी

रंगों के इस रंग

रंगीन हो गयी तस्वीर पुरानी 

Sunday, March 24, 2013

प्रीत

गीत ऐसा मैं गुनगुनाऊ

तेरी साजो की तरन्नुम पे जिन्दगी लुटाऊ

तू गजल मेरी

मैं ताल बन गीत तेरे गुनगुनाऊ

गीत ऐसा मैं गुनगुनाऊ

प्रेम सुधा रंग बरसे

राग ऐसी छेड़ जाऊ

गीत ऐसा मैं गुनगुनाऊ

प्रीत तू मेरी

मीत तेरा मैं बन गीत तेरे गुनगुनाऊ

गीत ऐसा मैं गुनगुनाऊ

इस कशिश की चाँदनी

मधुर संगीत बन गीत तेरे मैं गुनगुनाऊ

गीत ऐसा मैं गुनगुनाऊ

तेरी साजो की तरन्नुम पे जिन्दगी लुटाऊ

गीत ऐसा मैं गुनगुनाऊ


 

मैं

मैं तो वो गागर हु

जो प्रेम सुधा छलकाता जाता हु

मीठे बोलों की एक एक बूंदों से

प्रेम सागर बहाता जाता हु

हर सुधा कंठ को

प्रेम अमृत रसपान कराते जाता हु

मैं तो वो गागर हु

जो प्रेम सुधा छलकाता जाता हु

Friday, March 22, 2013

नया जन्म

लूट लिया उन प्यार के बोलों ने

खोल दिया अंतर्मन के द्वारों को

कह उठी दिल की आवाज़ भी

चल जन्म फिर से लेते है

एक दूजे के होके जिते मरते है

गुजर जायेगी जिन्दगानी

नहीं तो ऐसे ही गुमनामी में कही

छोड़ इसलिए कसमे वादों को

चल वरण करे एक दूजे को

जन्म नया फिर से ले

तोड़ हर बंधन की माया को

तोड़ हर बंधन की माया को
 

Monday, March 18, 2013

समाधि

जितनी जुड़ने की कोशिश की

उतना ही टूटता गया

जाने कौन भँवर में फंस गया

वेग जमाने की लहरों का प्रचंड ऐसा

थपेड़े भी लगे थप्पड़ समान

कोलाहल में जैसे

गुम हो गयी चीत्कार कहीं

अनसुनी हो गयी गूंज कहीं

नजर ना आया जमाने को

आँखों का सागर कभी

जल समाधि ले ली चेतना ने

होके घायल तभी

 

दर्पण

दर्पण  में अपना अक्स निहारु

फितरत कभी बदली नहीं

दर्पण  झूट कहता नहीं

प्रतिबिम्ब सत्य निहारु

रंग भरे जो फितरत में

तस्वीर वो निहारु

दिखे पर वो ही श्वेत श्याम रंग

कैसे अपना अक्स बदल डालू

बेदर्द रंगों के दर्द

भरने ना दे जब अक्स में अपने रंग

क्यों फिर मैं दर्पण निहारु

गुस्ताखी ये हो ना जाए कही

क्यों ना इसलिए दर्पण ही बदल डालू 

Monday, March 11, 2013

जंग का पिटारा

खुले जो जंग का पिटारा

कर्कश भरे कर्णभेदी

शब्दों के बाण चले

इस मुहँ जुबानी जंग से 

परवाह नहीं

कितने रिश्ते आहत हो जाए

मर्यादा जुबाँ भी ऐसी लाँघ जाए 

झड़ी बेशर्मी की लगा जाए

कटाक्ष दिलों को ऐसे भेद जाए

लहू जैसे पानी पानी हो जाए 

बच ना पाए संधि की कोई गुंजाईस

कई रिश्ते नाते इस दरमियाँ शहीद हो जाए

बदकिस्मती से अपने ही अपनों से हार जाए 

Thursday, March 7, 2013

सृष्टि

खिल रही नये पौध में कपोल प्यारी

मिल रही रूह जीवन से

अंकुरित हो रही नयी फसल तरारी

जल बन अमृत लहू

सींच रही कण कण में जीवन सुधा निराली

भर रही नये रंग प्रकृति

आत्मचित कर रही कायनात की सृष्टि  

Tuesday, March 5, 2013

शिकायत

माँ

तुने बेटे बेटियों के लिए ममता क्यों है बांटी

यह शिकायत नहीं एक सवाल है

होते हुए भी तू नारी

चाहत बेटों की ही क्यों है

ऐसी भी क्या खता

बेटियाँ लगती तुमको भारी है

कन्या भ्रूण हत्या खिलाफ

आवाज़ बुलंद क्यों नहीं तुम्हारी है

ओ माँ तुम्हे मैं ऐ याद दिला दूँ

बेटे बेटियों में फर्क बतला दूँ

बेटी बेटी रहती मृत्यु तक

पुत्र पुत्र रहता शादी तक

भावना फिर क्यों तेरी ऐसी है

बस पुत्र कामना ही तेरी भक्ति है

सुन हमारी भी किलकारी की नाद

क्यों गम हो जाती तुम्हारी साँसों की झंकार

अब ओर करो ना हम पे अत्याचार

रख हमें भी अपनी करुणा की छावं

दे दो हमें भी जीने का अधिकार

दे दो हमें भी जीने का अधिकार