Monday, October 29, 2012

नफरत

नफरत का कोहरा ऐसा छाया

विलुप्त हो गयी प्यार की भाषा

अपने ही अपनों के दुश्मन

घृणा होड़ का पसरा ऐसा साया

तरकश कटारी बाण से ज्यादा

पैनी हो गयी जुबाँ की भाषा

यकीन एतबार का उठ गया साया

नफरत का जो तूफां आया

पसर गयी जैसे अमवास की छाया

छंट गया जैसे विश्वास का साया

सही गलत सब हो गए बेमान

हर इंसां हो गया नफरत का शिकार

जमीर की तो अब करो ना बात

लहू हो गया पानी सामान 

दीवाना

मयिअत पे हमारी रोने तुम ना आना

पता जमाने को चल जाएगा

दीवानों की फेहरिस्त में

एक नाम और जुड़ जाएगा

जनाजे को तुम कांधा ना लगाना

माहौल मातम का

आंसुओ का सैलाब बन जाएगा

कब्र पे हमारी तुम कभी ना आना

अश्क तुम्हारे नयनो में देख नहीं पायेंगे

गुजारिश हमारी कबूल फरमाना

ख्वाइश आखरी हमारी

पूरी कर जाना तुम

कब्र पे हमारी

दीवाना नाम लिखवा देना तुम



 

बेजुबाँ

दिल की हसरतों को काश हवा दे पाते

मोहब्बत को अपनी जुबाँ दे पाते

तेरे ख्यालों की ताबीर बुना करते थे

काश तुमको ये बतला पाते

पाक ऐ बेनजीर थी चाहत

तुमको ये समझा पाते

मोहब्बत को अपनी जुबाँ दे पाते

चाहा सिर्फ तुम्हे

तुमको ये अहसास करा पाते

हर साँसों पे लिखा तेरा ही नाम

तुमको ये दिखला पाते

मोहब्बत को अपनी जुबाँ दे पाते

तुम थी मेरी दुआ

फ़रियाद तुम्हे ये सुना पाते

मोहब्बत को अपनी जुबाँ दे पाते

दिल की हसरतों को काश हवा दे पाते

मोहब्बत को अपनी जुबाँ दे पाते

पुरानी पहचान

धडकनों से दिल की पहचान पुरानी है

तेरे ख्यालों से दिल की गिटार बजे

अहसास ये रूमानी है

धडकनों से दिल की पहचान पुरानी है

तेरी साँसों से सजे धडकनों की साज

ख्याल ये बड़ा ही रूमानी है

धडकनों से दिल की पहचान पुरानी है

धडकनों से दिल की पहचान पुरानी है

Saturday, October 27, 2012

रूमानी रंग

जिन रंगों में जिया करते थे

उन रंगों से नाता तोड़ लिया

बात रंगों में अब वो ना थी

मुस्कान उनमें अब पहली सी ना थी

बदल गयी थी तस्वीर पुरानी

श्याम स्वेत हो गयी थी जिन्दगी बेचारी

लाचारी थी यह बड़ी भारी

रंगों ने बिगाड़ दी थी तस्वीर की कहानी

अधिक रंगों के पुट से

बदरंग हो गयी थी जिन्दगी बेचारी

रंग अब जीवन से दूर थे

पर श्याम स्वेत भी कहा रूमानी कम थे 

गुमराह

गुमराह हो जब कभी

अनजाने सफ़र को निकलो तुम कभी

आँखे बंद कर

पता दिल से पूछना तुम वही

एक नयी राह पाओगे तुम तभी

होगी मंजिल दूर कहीं

पर करीब उसे पाओगे तभी भी

 

Thursday, October 25, 2012

जमीं

अपनी जमीं तलाश रहे कदम

पेड़ों के झुरमुट में

जड़े अपनी तलाश रहे नयन

नाता जुड़ा खोख से जैसे कोई

वैसे अपनी जड़े तलाश रहे कदम

कौन सी थी वो छत्र छाया

पड़ी जहाँ कदमों की साया

बिसरे अतीत की छावं से

बिछुड़ ना जाए ये साया

निशाँ पड़े थे जहा पर

गर्त पड़ी थी वह पे

कदमों में जैसे बिच्छे पड़े थे तीर

पलकों में जैसे कैद नयनो के नीर

राह भटके ना फिर कभी

तलाश रहे कदम अपनी जमीं की मित

 

आत्मविश्वास

निश्चल दृड़ आत्मविश्वास

उत्सव उमंगों की बहार

ना कोई अग्निपथ

ना कोई कांटो का हार

शीतल शान्त मनभावन

सहज करदे ह्रदय पावन

संयम स्थिर गुणबखान

शिखर कामयाबी क़दमों के पास

निश्चल दृड़ आत्मविश्वास

उत्सव उमंगों की बहार


 

Tuesday, October 16, 2012

खुबसूरत अहसास

सकून एक सुखद अहसास है

यादों का खुबसूरत गुलिस्ताँ है

महकती है फिजा गुजरे कल की

याद आती है जब गुजरे पल की

खिलती उठती है मुस्कान

मिल जाती है जैसे कोई खोई पहचान

पनपने लगता है यह अहसास

यादों में सिमटा है खुबसूरत अहसास

खुबसूरत अहसास II

 

Sunday, October 14, 2012

दो पल

जिन्दगी दो पल ही काफी थी

बारिश की दो बूंदे ही बाकी थी

जीवन कण भरा था जिनमे

संजीवनी सुधा सजी थी उनमे

उस दो पल की जिन्दगी ही काफी थी

जिन्दगी दो पल ही काफी थी

साँसे अभी ओर भी बाकी थी

धडक रही थी धड़कने

जीवन प्राण भरे थे जिनमे

उस दो पल की जिन्दगी ही काफी थी

जिन्दगी दो पल ही काफी थी

चाहत जिन्दगी की अभी बाकी थी

दिल की आवाज़ सजी थी जिसमे

प्रेम सुधा रस भरी थी जिसमे

उस दो पल की जिन्दगी ही काफी थी

जिन्दगी दो पल ही काफी थी







 

Thursday, October 11, 2012

शहादत

हर उस जज्बे को सलाम है

शहादत के लिए जिसका सपूत तैयार है

बड़े ही गर्व की बात है

पूत  वो महान है

लहू तो सभी का लाल है

पर इन शूरवीरों के

लहू के हर कतरे में पैगाम है

मातृ भूमि की रक्षा के  लिए

सब कुछ न्योछार है

रहे सब अमन से

इसलिए करने अपना बलिदान तैयार है

 

Tuesday, October 9, 2012

अभिव्यक्ति

अभिव्यक्ति के सपंदन मात्र से

लहर वो चली आयी 

आगोश में मानो जैसे जन्नत चली आयी

ये आरधना का असर था

या प्रार्थना का स्पर्श था

पर पुलिंदा विचारों का

व्यर्थ का अनर्थ था

ओजस्व वाणी के आगे जैसे

समस्त जन नतमस्तक था

स्वतंत्र धारा की इस वेग का

सृजन अभिव्यक्ति के गर्भगृह में ही छुपा था 

किनारा

जिन लहरों पे तुम्हारा नाम ना था

उन लहरों से हमारा नाता ना था

उफनते साहिलों को

तुम्हारी मौजों का ही सहारा था

पर हमारे लिए

तुम्हारे प्यार का किनारा ही काफी था 

सुन्दर उपहार

कर  रहे थे जिस शुभ बेला का इन्तजार 
 
ले आयी  नन्ही परी 
 
खुशियों की वो सौगात 
 
 भर गया माँ का आँचल 
 
गूंज उठा घर का आँगन 
 
धन्य हो गया सारा परिवार 
 
दिया ईश्वर ने ऐसा सुन्दर उपहार 

Wednesday, October 3, 2012

दीवानगी की जंग

लुट ली जमाने ने अस्मत मोहब्बत की

रुसवा हो गयी परछाई मोहब्बत की

सिमट गया दायरा

दब गयी मोहब्बत सीने में कहीं

बेआबरू वो कैसे हो

जुड़ी हो जिससे दिलों की धड़कन

सिसकियाँ भर फरमाया दिल

मोहब्बत है सबसे हसीन चीज

बाँध सर पे कफ़न

ओढ़ी जब प्यार की चादर

बदनाम कैसे फिर प्यार हो

जमाने को यह अहसास हो

दीवानगी की ये जंग

प्यार करनेवाले सरफारोसो के नाम हो !!

 

Tuesday, October 2, 2012

दरिन्दे

मंदिर की जीन्ने चढू कैसे

हाथ रंगे है खूनी दरिन्दे से

स्वार्थ सिद्ध के लिए

नाता तोड़ लिया

ना जाने कितने संस्कारों से

आत्ममंथन करूँ कैसे

गिरवी रख दी दिल की आवाज़

झूठी शान के लिए

छटपटा रहा हूँ

पर उड़ू कैसे

कतरे पर इन्ही हाथ दरिन्दों  ने

 इन्ही हाथ दरिन्दों ने !!