Monday, August 27, 2012

मरघट की छाया

खौफजदा है जिन्दगी

मन मस्तिष्क में बज रही

दहशत भरी ध्वनि

आतंकवाद ने पसारा ऐसा साया

उजाड़ गया सुन्दर चमन सारा

फैला  चारों ओर ऐसा सन्नाटा

दिन के उजाले में भयभीत कर दे

हलकी सी अफवाहों की काली साया

रोंगटे खड़े हो जाए

देख सुन जिस तांडव की माया

पसरा दी उसने जन्नत में भी

मरघट की छाया , मरघट की छाया 

Saturday, August 25, 2012

एक अल्पविराम

अल्पविराम  क्या लिया

शिथिल  जिन्दगी पड़ गयी

उफनते सैलाब को

ठहराव की वजह मिल गयी

जोश मंद हो गया

जूनून वो जाने कहा खो गया

वजह जो जीने की थी

मंजिल मिलने से पहले ही

राह भटक गयी

एक अल्पविराम ने

सारी कायनात बदल डाली

जीने के लिए आलस का त्याग करने की

नसीहत दे डाली

 

Tuesday, August 21, 2012

अधूरे सपनों की कहानी

वो अधूरे सपनों की कहानी

मैं था और थी मेरी परछाई

चलते चलते बिछुड़ना

नियति थी हमारी

प्रेम पिपासा चक्षु जिज्ञासा

ह़र आहट बुनते

एक नयी कहानी

लफ्जों की उनको ना थी आजादी

मिलके बिछड़ने की

बड़ी अनोखी थी ए प्रेम कहानी

गंतव्य

पहुँच गंतव्य के करीब

फुट पड़े क़दमों के बोल

आलिंगन शिखर को करने

बेताब हो उठे बाहों के घोर

डबडबा आयी आँखे

पा मंजिल का छोर

अर्जित हो गयी ख्याति

छा गया नाम चहुँ ओर

Wednesday, August 15, 2012

दुआ

सालगिरह की इस बेला

नजराना क्या भेंट करूँ

उम्र हमारी भी मिल जाये आपको

तोहफा ए पेश करूँ

खुश रहे आप सदा

रब से बस यही दुआ करूँ

फूल

फूल बन वेणी में गूँथ

बालों में सज जाऊ मैं

माला में पिरों

गर्दन में सज जाऊ मैं

श्री चरणों में चढ़

कदमो से उनके लिपट जाऊ मैं

पर दिल कह रहा है

शहीदों की वेदी पे सज

जीवन अपना सफल कर जाऊ मैं


पारस

अवसर कभी मिला नहीं

प्रोत्साहित कभी किसीने किया नहीं

छिपी प्रतिभा से

जग रूबरू कभी हुआ नहीं

कला जो थी सुन्दर

उभर कभी पायी नहीं

कद्रदान कभी मिले नहीं

हुनर को परख सके

पारस ऐसा कभी मिला नहीं

Monday, August 13, 2012

लाचार जिन्दगी

अकेलेपन की तनहाइयों में

जिन्दगी गुजरे कल में खो गयी

दायरा सिमट गया

झर झर नयन स्वत: ही बह पड़े

आंसुओ की माला

यादों की बारात बन गयी

इस परछाई के संग जीने को

जिन्दगी लाचार हो गयी

गुमनाम

एक वो गुमनाम थी

बसी जिसमे जान थी

मूरत थी वो प्यार की

हार पल लबों पे

उसकी ही बात थी

चली गयी एक दिन

जाने वो किधर

सपना बन रह गयी मोहब्बत

Wednesday, August 1, 2012

जन्नत का द्वार

मदिरालय की सीढ़ी चढूं

या शिवालय की चौखट चुमू

कदम कह रहे है

जन्नत की जिन्ने चढूं

ना मयखाने में वो आग है

ना मंदिर में सुप्रकाश है

स्वर्ग के द्वार खुले

लिए फूलों के हार है

डगर यह आसान नहीं

क्योंकि मृत्यु ही जन्नत का द्वार है