Tuesday, July 24, 2012

सागर की तलहट्टी

सागर की तलहट्टी

जैसे कोई सपनों की नगरी

स्वछन्द विचरण करती

तरह तरह की जल परियां

मुस्का रही हो मानों जैसे

खिलखिलाती सपनों की दुनिया

गहरे नीले पानी में समाई

जैसे तिल्सिम भरी काल्पनिक दुनिया

कह रही हो कुदरत मानों

जैसे यह है मेरी जादुई दुनिया

Saturday, July 21, 2012

पगली

क्या हुआ जो जुदा हो गयी

छोड़ अपनी दुनिया तन्हा हो गयी

सुनी किसने दिल की फ़रियाद है

इन्साफ कहाँ

ह़र तरफ आंसुओ का सैलाब है

करली पार जिसने ऐ तरणी

जीत गयी मानो जैसे कोई पगली

Tuesday, July 17, 2012

अरमानों के रंग

उड़ रही जिन्दगी की पतंग

लगा सपनों के पंख

रंग बी रंगों से रंगी

कर रही अटखेलियाँ

इन्द्रधनुषी रंगों के रंग

जीवन साँसों ने थाम रखी

जैसे इसकी डोर

कटने से पहले भरने इसमें

सच्चे सपनों के रंग

उड़ा इसे पूरे करने

जीवन अरमानों के रंग

जीवन अरमानों के रंग

Sunday, July 15, 2012

इकरार

बेजुबा थी मोहब्बत

लफ्जों में वयां ना कर पाये

नयनों की भाषा में

इकरार कर ना पाये

तरसते रहे जिनके लिए

उनसे नजरे भी मिला ना पाये

फरयादी

अपनी तो अल्लाह सुने ना राम

करे फ़रियाद किससे

तुम ही बतलाओ ओ पालनहार

ह़र द्वारे शीश झुकाए

फैला झोली अर्ज लागए

पर इस बदनसीब पर

तुमको तरस ना आये

Friday, July 13, 2012

गुमनाम

किसीने कभी ऐ ना जाना

हाले दिल हमारा पहचाना

जिसे हुस्न पे मर मिटे थे

वो मुमताज महल कहा है

चुना दी थी जिसके लिए मोहब्बत

दिले दरों दीवार

दफ़न कर दीये थे

सुलगते दिलों के अरमान

कहा खो गयी उस गुमनाम की पहचान

Wednesday, July 11, 2012

खुशबू

निकली थी आप जिसे गली

भटक रहा हु उस गली

महक आपकी छिटक रही

आपके चले जाने के बाद भी

उस गली ओ महजबी

ढाई आखर का ए काम है

पैगाम ए आपके नाम है

महरूम हो गया खुद से

घुल गयी साँसों में

आपकी खुशबू की महताब है

Monday, July 9, 2012

उदासी

हुस्न ने पूछा जिन्दगी से

तू इतनी उदास क्यों है

कहा जिन्दगी ने

ढल गयी जवानी तुम्हारी

अब दरकार नहीं तुम्हारी

छोड़ अब तुझे जाना है

आशियाँ नया बसना है

संग तेरे जो पल बिताएं

यह उदासी उन्ही यादों का साया है

ख्वाहिसे

जिन्दगी कभी इतनी कम लगती है

खुद से शिकायत करती है

एक पल नसीब नहीं

खुद को जीने के लिए

ढल गयी जिन्दगी

औरों को खुश रखने में

सफ़र के इस पल में

मिली ना फुर्सत एक पल के लिए

अधूरी रह गयी ख्वाहिसे

दफ़न हो गयी शिकायतें

किताब

किताब जिन्दगी की रंगीन थी

पर वो किताब अधूरी थी

कुछ पृष्ट रिक्त थे

चाह कर भी जिनमे रंग ना भर पाया

मुस्कराहट के पीछे छिपे आंसुओ को

शब्दों में वयां ना कर पाया

किताब के ह़र पन्ने को भर ना पाया

अत्याचार

अत्याचार सहने की इंतहा हो गयी

जुबाँ जो अब तलक खामोश थी

एकाएक बोल उठी

इस कदर ढाये तुमने जिल्मों सितम

नफरत की चिंगारी

सीने में धधक उठी

आवेश के आगोश में

चिंगारी शोला बन आँखों से फुट पड़ी

ह़र दरों दीवार तोड़ बोल चीख पड़ी

अब ना अश्रु बहेंगे

ना जुलोम सितम सहेंगे

सबक ऐसा देंगे

खुद अपने आपसे नफरत करने लगेंगे

पहचान

कांटे गुलाब की पहचान है

घटाएं बारिस का आगाज है

धड़कने दिल का पैगाम है

बुरे वक़्त ही सच्चे दोस्त की पहचान है

पल

कुछ पल तनहाइयों में गुजर गए

कुछ पल प्यार समझने को गुजर गए

जो पल बचे वो सिकवा शिकायत में गुजर गए

पर आंसू बहाने को

खुद को एक पल भी ना मिला

तलाशते रहे जिस पल को

वो पल कभी ना मिला

Tuesday, July 3, 2012

दृष्टिहीन समाज

दृष्टिहीन समाज हमारा

सुरसा की तरह बड़ रही

सवालों की छाया

फैला अँधियारा दूर तक

दिग्भ्रमित हो

भटक रहे नौ निहालों के कदम

गर्त समा रही चेतना सारी

स्वार्थ भावना से

संसय बनी कमजोरी हमारी

इस काल चक्र ने

बदल दिया सम्पूर्ण रूप

विभस्त हो गया समाज का स्वरुप

विभस्त हो गया समाज का स्वरुप

मिथ्या जग

मिथ्या जग सारा

बनावटी मुखोटा सारा

मुखोटे में छिपी मोह माया

दूर तक नहीं सत्य का साया

मिथ्या जग सारा

तन भी नश्वर

भस्म है ईश्वर

सत्य सिर्फ मौत का साया

बाकी मिथ्या जग सारा

Monday, July 2, 2012

एक सवाल

मुझसे जिन्दगी इतनी नाराज क्यों है

खफा खफा सी ह़र बात क्यों है

बार बार ह़र बार

शिकस्त ही क्यों इस नसीब में है

आखिर क्या वो बात है

कीया सारा बेकार है

नीरस हो निराश हो गयी जिन्दगी

अब तो ह़र बात एक नया व्यवधान है

जिन्दगी मेरे लिए

इम्तिहान से ज्यादा एक सवाल है