Thursday, May 31, 2012

दर्द की जुबां

काश मैं अपने दर्द को जुबां दे पाता

दर्द आखिर होता क्या है

ए खुदा तुमको भी ए बतला पाता

जो गम समेटे इस छोटे से दिल में

उनसे रूबरू तुमको भी करवा पाता

काश में अपने दर्द को जुबां दे पाता

जीन आँखों से आंसुओ ने भी नाता तोड़ लिया

उन सूनी आँखों कर दर्द तुमको दिखला पाता

अपने बिखरे सपनों के रंग तुमको वयां कर पाता

काश मैं अपने दर्द को जुबां दे पाता

Monday, May 28, 2012

उदासी

लग रहा गुलाब उदास है

मुरझाया कुम्हलाया जैसे खाब्ब है

गरज गरज बरस रहा अम्बर

जैसे करुण रुदन की पुकार है

घिर गया दिन में अंधियारा

जैसे सूर्य ग्रहण की छावँ है

बिखर गया ह़र रंग

जैसे कोई सूनी मांग है

लग रहा गुलाब उदास है

लग रहा गुलाब उदास है

मोम

तराशने लगे जब हाथ

पिघलने लगे पत्थर भी

जैसे मोम पिघल जाये

पा हुनर भरा हाथ

निखर आयी पत्थर की मूरत

बदल गयी किस्मत

जैसे बेजान जिस्म में

प्राण चले आये

Thursday, May 24, 2012

नंगे कदम

सूरज की तपिश तन झुलसाए

पैरों में छाले पड़ते जाये

मंजिल कहीं पीछे ना छुट जाये

नंगे कदम दौड़ा चला जा रहा हु

कांटे पत्थर चुभते जाये

लहुलुहान जिस्म होता जाये

कदम कहीं थक ना जाये

नंगे कदम दौड़ा चला जा रहा हु

पाने को आतुर

छूने को व्याकुल

करने सपने को साकार

नंगे कदम दौड़ा चला जा रहा हु

Thursday, May 17, 2012

कहानी

गुजरे कल की कहानी है

सपनो में ढली जिंदगानी है

धुन ना जाने क्या थी

मस्ती से सराबोर थी

रुकते नहीं कदम थे

मचलते रहते अरमान थे

जादू  में लिपटी

जैसे लय और  ताल थी

जीवन संगीत और गीत भरी धड़कने

रूह की जान थी

सपनो में ढली वो जिंदगानी थी




Wednesday, May 2, 2012

सवाल

संभव  नहीं हर सवालों के जवाब 

टटोल नहीं पाते  हर पल दिल की बात 

कभी कभी इसलिए अधूरी रह जाती है तलाश 

ओर बन जाती है जिन्दगी खुद एक सवाल 

Tuesday, May 1, 2012

किरण

सुबह की किरण नई सौगात ले आयी

जैसे खुशियों की बारात चली आई

चहक उठा मन झूम उठा तन

प्रभात बेला संदेसा नया ले आई

था जिसका इन्तजार

लो वो बेला चली आई

रोशनी की एक किरण

जीवन में नया उज्जाला ले आई

सुबह की किरण नई सौगात ले आयी

जैसे खुशियों की बारात चली आई

यादों का मेला

ले आया वक़्त वहाँ

यादों का मेला लगा था जहाँ

बीनने लगा यादों के गुल

खिलने लगे गुजरे कल के फूल

संजोने यादों का सफ़र

वक़्त ने दी थी दस्तक

चुन चुन यादों के फूल

समेटने लगा भूली यादों के गुल

मिल गया जैसे कोई बिछुड़ा अपना

रो पड़ा दिल

जैसे सच हो गया कोई सपना

एक पल को थम गया वक़्त हमारा

मिल गया बचपन

खो गया था जो जाने कहीं

छुड़ा हाथ हमारा

ले आया वक़्त वहाँ

यादों का मेला लगा था जहाँ

रूह

गुजरा बचपन जीन गलियों में

रूह बस्ती है उन पगडंडियों में

बात उस शहर की थी बड़ी निराली

हार पेड़ पोधो से थी पहचान हमारी

गली मोहलो की थी शान निराली

हँसी ठिठोली में गुजर जाती थी शाम सुहानी

खुले आसमां तले

तारे गिन गिन

सपनों में खो जाती थी रात सयानी

बस गयी इन सबों में रूह हमारी

गुजर गया बचपन

छुट गया शहर संगी साथी

पर रह गयी यादें वही कही भटकती

रूह बस्ती है इनमे जैसे हमारी

मीठी बातें

अधखुली पलकें

मंद मंद मुस्काती साँसे

कह रही शरारत निगाहें

खामोश लव

ठंडी आहें

कर रही दिल की बातें

देख खिलते गुलाब को

याद आ गयी

प्रियतम की वो मीठी बातें