Sunday, December 23, 2012

दामिनी

सिसकती रही बेबस दामिनी

पर उन दरिंदो को जरा भी रहम ना आई

शर्मसार हो गयी सभ्यता सारी

छिन्न भिन्न हो गयी कायनात सारी

ढाये जालिमों ने ऐसे जुल्म

रूह शैतान की भी काँप गयी

बना अपनी हवस का शिकार

सरिया लोहे की खोख में उतार दी

फेंक दिया बीच राह नग्न कर

कुदरत भी लज्जा गयी

दिलाने इन्साफ अपने को

झुन्झ रही दामिनी मौत से

सुन उसकी आत्मा की अंतर्नाद

खुदा भी खुद खौफ जदा हो गयी

सुनो ये दुनियावालों

दामिनी है तुम्हे पुकार रही

रहनुमा ना बन सके

हमदर्द बन

इस रण में तुम भी शामिल हो जाओ

उसके इन्साफ के लिए

सरकार तो क्या

खुदा से भी तुम लड़ जाओ

कोई तो सच्चा मसीहा बन

ऐसी पुनरावृति से समाज को बचा लाओ

 

2 comments:

  1. behad gambhir prastutiखुदा से भी तुम लड़ जाओ

    कोई तो सच्चा मसीहा बन

    ऐसी पुनरावृति से समाज को बचा लाओ

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