Friday, November 9, 2012

सपनों की रात

तुम कुछ कहती तो मैं कुछ सुनता

सारी रात यूही करवटें ना बदलता

नींद कहा आँखों में थी

सपने की रात गुजर जाने को थी 

खामोश मगर मग्न

ना जाने तुम क्या विचार रही थी

नई नवेली दुल्हन जैसे शरमा रही थी

बाहों को तेरे आगोश की आस थी

पर रात ढल जाने को बेताब थी

बेकरार निंद्रा भी थी

पर आँखों में कहा उसकी परछाई थी

करवटों में रात खोने को लाचार थी

सुबह की लालिमा उदय होने को त्यार थी

 

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