Monday, October 29, 2012

नफरत

नफरत का कोहरा ऐसा छाया

विलुप्त हो गयी प्यार की भाषा

अपने ही अपनों के दुश्मन

घृणा होड़ का पसरा ऐसा साया

तरकश कटारी बाण से ज्यादा

पैनी हो गयी जुबाँ की भाषा

यकीन एतबार का उठ गया साया

नफरत का जो तूफां आया

पसर गयी जैसे अमवास की छाया

छंट गया जैसे विश्वास का साया

सही गलत सब हो गए बेमान

हर इंसां हो गया नफरत का शिकार

जमीर की तो अब करो ना बात

लहू हो गया पानी सामान 

3 comments:

  1. bahut sundar srijan, badhai.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें , आभारी होऊंगा.

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