Monday, July 9, 2012

अत्याचार

अत्याचार सहने की इंतहा हो गयी

जुबाँ जो अब तलक खामोश थी

एकाएक बोल उठी

इस कदर ढाये तुमने जिल्मों सितम

नफरत की चिंगारी

सीने में धधक उठी

आवेश के आगोश में

चिंगारी शोला बन आँखों से फुट पड़ी

ह़र दरों दीवार तोड़ बोल चीख पड़ी

अब ना अश्रु बहेंगे

ना जुलोम सितम सहेंगे

सबक ऐसा देंगे

खुद अपने आपसे नफरत करने लगेंगे

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