Sunday, April 1, 2012

कुछ

कुछ टटोल मैं रहा हु

आंसुओ का सागर समेट रहा हु

उस अनछुई खुशी को

पहेली बन ऊलझ गयी जो

अन्दर अपने टटोल रहा हु

कुछ टटोल मैं रहा हु

आंसुओ का सागर समेट रहा हु

मिल जायेगी जो मृगतृष्णा

भर आयेगे ऐ दो नयना

उस पल छलकाने खुशियाँ

इस पल समेट रहा हु आंसुओ का झरना

कुछ टटोल मैं रहा हु

आंसुओ का सागर समेट रहा हु

कुछ मैं टटोल रहा हु

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