Thursday, September 23, 2010

जुझारूपन

जूझ रहा हु ऐसे

ह़र कदम चलना सीख रहा हु जैसे

गिरते उठते आगे बढ़ रहा हु ऐसे

खुद के क़दमों पे खड़ा होना सीख रहा हु जैसे

मंजिल अभी भी बहुत दूर वैसे

पर लग रहा है ऐसे

कामयाबी कदम चूम रही हो जैसे

Wednesday, September 22, 2010

छाया

बातों में तेरी लहराती है गीतों की माला

सुनके नाचे मन की अभिलाषा

इतनी हसीन है तेरी आँखों की मधुशाला

देखू जब भी इनमें

सुध बुध भूल जाती है दिल की भाषा

ओ सुन्दरी कैसी है ये तेरी माया

मेरी परछाई में भी दिखे तेरी ही छाया

Thursday, September 16, 2010

तू ही तू

जुस्तजू तेरी ऐसी लगी

आँखों में तेरी ही तस्वीर बसी

देखू जिधर भी

बस तू ही तू दिखी

मेरे पूज्य पिता

जीवन सदैव ऋणी रहेगा आपका

पितृ स्नेह लुटाया ऐसा आपने

भर गयी झोली हमारी आपके प्यार से

पर बिन कहे ऐसे गये

खामोश हो गयी आवाज़ भी आपकी

तलाश रही है नजरे

आप की छावँ आज भी

छलछला आती है आँखे

जब भी आती है याद आपकी

बस एक बार वापस चले आओ

चाचा जिन्दगी को तलाश आज भी आपकी

Sunday, September 12, 2010

भाषा

शब्दों का है मायाजाल

तोड़ मरोड़ करो ना इसको बदनाम

रचो सुन्दर शब्दों का जाल

मिला अक्षरों से अक्षरों का साथ

मिलेंगे नए नए शब्द हजार

पर याद रहेगी

सिर्फ मीठी भाषा ही मेरे यार

इसलिए करो सुन्दर भाषा का इस्तेमाल

गुमशुम

गुमशुम है परेशान है

दिल आज चुपचाप है

बात कुछ ख़ास है

दिल के बोल बंद आज है

मौन है मन उदास है

कहीं खो गया दिल आज है

विरह है या प्यार है

दिल का बुरा हाल है

ना जाने किसके लिए

दिल आज बेकरार है

Friday, September 10, 2010

नियति

अहसास है जिन्दगी

कुदरत की बख्शी हुई है नियति

जियो ह़र पल खुशियों के साथ

ह़र लहमा बन जाये यादगार

कुदरत भी कह उठे

तू है सच्चा दिलदार

जी तुने साँसे खुशियों के साथ

खुशबू से तेरी चमन में छा गयी बहार

ह़र कोई करेगा तुझको याद

जी जिन्दगी तुमने खुलकर यार

बेचारा

रूप सलोना मन मोहना

मटकाए जब नयना

मन फिरने लगे हो बाबरा

पतली कमर सुन्दर सी लचक

ठुमक ठुमक चले जब

मन डोले हो बाबरा

कंचन सी काया

हिरनी सी चाल

घायल हो गया दिल बाबरा

कभी

मिले एक सदी बाद

फिर से बिछड़ जाने को

तड़पता रहा मन

जलती रही अगन

बदली नहीं नियति खास

पर खेल रचा ऐसा खास

फिर कभी हो सका ना उनका साथ

ओझल

पंचतत्व से बना शरीर

पंचतत्व में मिल जायेगा

कर्म हो अच्छे तो

यादें सिर्फ रह जायेगी

वर्ना स्मृतिपटल से वो भी

ओझल हो जायेगी

पर्व

एक ही रब के बन्दे हम सभी

आओ मनाये ह़र पर्व खुशियों के साथ

हो शरीक ईद में भी

लगाए इसमें चार चाँद

Sunday, September 5, 2010

माँ की ममता

ओ माँ तेरी ममता बड़ी दुलारी

इस जग में नहीं कोई तेरा सानी

रोम रोम तेरी भरी दया

तुझे से बड़ा ना कोई बलिदानी

कर्ज तेरा चुका सके ना कोई

माँ तुझ सी नहीं इस धरा पर कोई

तेरे ही चरणों में जन्नत की खुशियाँ

तेरे नाम में ही समाई सृष्टि सारी

माँ तेरा नहीं कोई सानी

माँ तेरी ममता बड़ी दुलारी

सजा

हुक्म सुनाया दिल ने

सुन उनकी प्यारी फ़रियाद

चुरा लिया नूर तुमने इन आँखों का

कैसे कर दू तुम्हे माफ़

खता नहीं

किया है तुमने संगीन अपराध

सजा भुगतनी होगी तुमको इसकी

गुजारनी होगी ता उम्र कैद हो बाहों में मेरी

माँ

माँ तुम कीर्ति हो कुदरत की बेमिसाल

सर झुके तेरे ही चरणों में बारम बार

सृष्टि रचे तेरे ही पुण्य प्रताप

रब से भी पहले तुझे ही पुकारे

सारे जन अपार

हा माँ तुम ही वो महान अवतार

जिसके आगे शीश नवाये

ईश्वर भी खुद आय

सच्चाई

पढ़ हमारी रचना

कहा एक मित्र ने

क्यों लिखते हो दर्द ए दास्तान

लिखो कुछ ऐसा

पढ़ जिसे आ जाये जोश फुर्तीला

कहा हमने

मित्र नहीं ए हमारे बस में

लिखू सिर्फ दिल बहलाने के वास्ते

मुँह मोड़ नहीं सकता मैं

निष्ठुर सच्चाई के आगे

Thursday, September 2, 2010

अभिशाप

जन्म लेना है वरदान

जिन्दा रहना है अभिशाप

नरक से बदतर है जिन्दगी

कीमत जिन्दा रहने की ऐसी

जो मरकर भी छोड़े ना साथ

घुट घुट रेंगती है जिन्दगी

बिन पानी जैसे मछली

तड़पती है जिन्दगी

ह़र पल कहीं ना कहीं

बिकती है जिन्दगी

जिन्दा रहने के लिए

क्या कुछ नहीं कराती है जिन्दगी

खुद से हार , बन गयी अभिशाप

ओर देह बन गयी एक जिन्दा लाश

अजनबी

अजनबी शहर अजनबी लोग

ढूंड रही नज़र तलाश रही छोर

मन हो उदास भटक रहा

कभी इस गली

कभी उस मौहले की ओर

बेबस आँखे घुर रही गुजरे पल की ओर

अब तो याद भी नहीं

जाना है किस ओर

अजनबी शहर अजनबी लोग

रुसवा

यूँ लगे , जिन्दगी हमसे रुसवा हो गयी

चहरे पे उदासी की लकीरें उभर गयी

अनजानों के बीच

जिन्दगी कैद हो रह गयी

लाख जतन की

पर वो खुशी फिर मिल ना सकी