Sunday, January 31, 2010

युवा

स्वर विरोध के उठने लगे

मुखर युवा होने लगे

शक्ति संगठित होने लगी

विद्रोह का विगुल बजने लगा

एक नयी क्रान्ति होने लगी

करके लेगें दम खात्मा आतंक का

इस जय घोष से अमन की बयार बहने लगी

शांति की सूत्रपात होने लगी

दो शब्द

कभी अपने लिए भी लिखता हु

जब कभी दिल रोता है

दो शब्द बुनता हु मैं भी

तन्हाईओं के अकेलेपन में

खुद से लड़ता हु जुड़ता हु

कोई बात दिल को छू जाये

उसे शब्दों में पिरों लिख लेता हु

अक्सर औरों के लिए लिखता हु

पर जब दिल भर आता है

दो शब्दों को अपने लिए भी लिख लेता हु

रोते रोते

रोते रोते ये पता चला

रोने को ओर आंसू बचे नहीं

उमड़ा था आंसुओ का जो सैलाब

सुखा दिया उसने सभी नदी तालाब

अब जब आंसू ही बचे नहीं

फिर किस कर के रोये

इसलिए मन ही मन रोये ताकि

आंसू की जरुरत ही होवे नहीं

कहना है बस इतना सा

दिल रोता रहे ओर आंसू नजर आये नहीं

अभिशप्त

जिन्दगी मेरे लिए अभिशप्त है

चलना इसपेमेरे लिए दुर्भर है

जीने की कोई ललक मेरी बची नहीं

फिर भी खुदा है की मेरे को मौत देता नहीं

कौल

कौल हमने लगायी तीन बार

पर उनको समझ नहीं आयी यार

जाग गया मोहला सारा

सुन शोर बौखला आया

आधी रात गए

किस गधे ने है शोर मचाया

देख ये तमाशा

जोर से मैं चिल्लाया

बीबी खोल नहीं रही दरवाजा

उसको जगाने मैं तो बजाऊंगा बेन्ड बाजा

हो रही हो तुम लोगों को तकलीफ

करलो कान बंद तुम सारी भीड़

इतने में बीबी की नींद जगी

समझ आ गया सारा माजरा

फिर पी ली है हद से ज्यादा

पकड़ बाल हमको ले गयी घर के अन्दर

ओर बंद कर दिया गुशलखाने के अन्दर

अपनी बात

होता जो कोई माध्यम पास

कह पाता अपनी बात

सहज रह सकता नहीं

भावनावों को व्यक्त कर सकता नहीं

मुश्किल तो यही है यारों

चाह कर भी अपनी बात कह पाता नहीं

कमी

कमी है मुझ में ऐसी कोई

प्यार कोई करता नहीं

नफरत के काबिल भी समझता नहीं

दोस्त कोई बने नहीं

दुश्मनों की कमी नहीं

प्रर्यत्न करू अच्छा करने की

पर होवे बिलकुल उसके उलट

इस कडवाहट से जिन्दगी बदली

आने लगी है ह़र बातों पे झंझलाहट

पर खुद में कमी की तलाश अब भी है जारी

रात ना गुजरे

चन्दा तू होले होले चल

रात इतनी जल्दी जाये ना गुजर

करले जी भर बातें प्रियतम संग हम

बस रखना तेरी चांदनी को थोडा काम

घूँघट जब सरकेगा निकलेगा मेरा भी चाँद तब

देख के उसको छिप ना जाना झट

चन्दा मेरे थोडा तो ठहर

जब तलक ना हो दीदार तब तलक तो ठहर

मिलन के इस पल का तू गवाह तो बन

चन्दा तू होले होले चल

ये रात इतनी जल्दी जाये ना गुजर

Friday, January 29, 2010

पोल

बच्चों ने मचाया शोर

खुल गयी शेर की पोल

मुन्ना बन फिर रहा शेर का दोस्त

देख सामने बिल्ली रानी

शेर ने जोर से किलकारी मारी

डर लागे मुझे तुझसे बिल्ली रानी

मैं नहीं हु कोई शेर

रोब जमाने बच्चों पे

मैंने पहन ली शेर की खाल

अब कभी नहीं करूँगा ऐसी शैतानी

माफ़ कर दो मुझको ओ बिल्ली रानी

खुलते ही शेर की पोल

बच्चों ने मचाया शोर

मुन्ना हो गया शर्म से ढोल

दुर्भर

डर खौंफ भय आतंक

दुर्भर है जीना इनके बीच

जीना है तो सीखना है

इनसे मुकाबला करना है

उत्पन कोई कु विकार हो ना पाये

माहोल ना बदले ना जाये

परिस्थिथि बिगड़ ना पावे

रखना होगा मन मस्तिष्क को जोड़

वर्ना मुश्किल होगी खुशियों की खोज

ओर फिर जीना पड़ेगा

डर खौंफ भय आतंक के साये ही

अपना दर्द

दर्द आपने अपना बया किया

पर दर्द औरों का आप समझ ना पाये

स्वार्थी है आपकी फितरत

आप रोते हो बेमतलब

दर्द से ही है दर्द की पहचान

समझ लिया जो आपने दुनिया का दर्द

तो फिर दर्द की ना ही कोई बात है

Thursday, January 28, 2010

चुप चुप

गुपचुप गुपचुप चुप चुप

खामोश है जिन्दगी

बह रही है सिसकियाँ

उफन रही है जिन्दगी

सुनी सुनी है जिन्दगी

धधक रही है अंतर्व्यथा

जल रही है जिन्दगी

गुपचुप गुपचुप चुप चुप

खामोश है जिन्दगी

Wednesday, January 27, 2010

जमाने की नजर

हे रामा लागी किसकी नजर

टूट गयी मोतिओं की जोड़ी

बिछुड़ गयी हंसो की जोड़ी

हुआ पहले ऐसा कभी नहीं

यूँ लगे लग गयी नजर जमाने की

टूट गयी जंजीर रिश्तो की

बिखर गयी माला फूलों की

डोर प्यार की इतनी कमजोर ना थी

सच लग गयी किसीकी बुरी नजर

छुट गयी अपनेपन की यारी

बिछुड़ गयी जिंदगानी

खत्म हो गयी प्रेम कहनी

अन्धकार

कर रही सुबह का इन्तजार

कब हो उजाला ओर छट जाये अन्धकार

लड़ने अन्धकार से चाहिए एक हथियार

दीपक एक काफी नहीं

इसलिए कर रहा सूर्य का इन्तजार

ताकि इसकी रोशनी में गुम हो जाये अन्धकार सारा

Tuesday, January 26, 2010

दरकिनार

गुजारिस है बस इतनी सी

दरकिनार हमें कभी करना नहीं

खता अगर हो जाये कोई

दिल से उसे लगाना नहीं

खुदगर्ज कभी बनना नहीं

हमें सितम सहने के लिए

कभी अकेले छोड़ जाना नहीं

पुरानी पहचान

है अभी तलक अनजान

मिलोगी जब लगोगी

अपनी है कोई पुरानी पहचान

खासियत यही है खास

अजनबी होते हुए भी

है आप के साथ

विश्वास अगर ना हो

पूछ लेना दिल से अपना हाल

यह भी यही कहेगा

हमारा दिल है आपके पास

जलती धूप

मेघ में अटका

बदल ने गटका

फिर भी बरसी नहीं बर्षा

बदल ने ली डकार

गूंज उठी आवाज

हजम हो गए मेघ अप़ार

कोंध उठा आसमान

छट गए बादल

खिलखिला उठी धूप

बिन बरसे गुजर गये बादल

मिली ना कोई राहत

जल उठे जलती धूप से

दुर्गति

नसीहत देते है सभी

साथ कोई देता नहीं

भूल कोई हो जाये तो

बक्श ते नहीं

दुर्गति करते है ऐसी

जिन्दा होते हुए भी

जिन्दा होते नहीं

खबर

यूँ लगा दोस्ती हमारी आप को रास नहीं आयी

बातें भी बस दो चार ही हुई

पर मिलन की आस पूरी ना हुई

ओर दोस्ती टूटने की खबर आयी

मुरादें

ओ रबा मेरे रबा

जब भी दर पे तेरी आता हूँ

मुरादें पूरी पाता हूँ

खाली हाथ आता हूँ

झोली भर जाता हूँ

ओ रबा मेरे रबा

सुनले मेरी फ़रियाद

जीना नहीं ओर यहाँ

ले मुझको तू अपने यहाँ

ओ रबा मेरे रबा

झुक ना जाये सर किसी ओर के आगे

यह झुके सिर्फ तेरे ही सजदे के आगे

ओ रबा मेरे रबा

करले दुआ कबूल मेरी

थाम ले मेरी छोटी सी बहियाँ

बिछुड़ ना जाये फिर यहाँ तक आकर

ओ रबा मेरे रबा

मितवा

जिया मोहरा लागे नाही

तेरे बिना जीया जाए नाही

ओ मितवा तुम को कैसे बताऊ

हाले दिल कैसे सुनाऊ

साँसे बंधी है तेरी साँसों से

बस एक अजीज है तू ही सबसे

ओ मितवा मेरे मितवा

तू ही बसी है दिल की धडकनों में

जिन्दगी है बस तेरे ही दम से

ओ मितवा जिया तेरे बिना लागे नाही

तेरे बिना जीया जाए नाही

ओ मितवा ओ मेरे मितवा

बिसात

तेरी सादगी के आगे अपनी कोई बिसात नहीं

तेरे प्यार से बढकर अपनी कोई पहचान नहीं

तेरी इबादत से आगे अपनी कोई दुआ नहीं

तेरी मेरी प्रेम कहनी से बढकर अपनी कोई जिंदगानी नहीं

Saturday, January 23, 2010

अनछुई

तुम हो अनछुई सी

छुए धुप तुम्हे गुनगुनी सी

खिलखिलाती हो फूलों सी

चलती हो हिरनी सी

लगती हो परी सी

फिर भी लगती हो अपनी सी

मीठी सी ये चुभन है अनछुई सी

Friday, January 22, 2010

समझदार प्राणी

ब्रह्माण्ड है विशाल धरा है महान

प्रकृति की कण कण में विराजे जीवन हजार

पग पग बिखरा पड़ा है सौन्दर्य रूप अपार

निज स्वार्थ मानव कर रहा है सृष्टि का विनाश

कैसे समझाए इस समझदार प्राणी को

जब नहीं बचेगी धरती तो कैसे बचेगा ब्रह्माण्ड

पछ्ताताप

यूँ लगता है कुछ ज्यदा ही मशगुल हो गैरों के लिए

तभी लापरवाह हो अपनों के लिए

मशगुल इतने भी ना होवो की

जरुरत हो जब तब कोई नजर ना आये

ओर पछ्ताताप की अग्नि में मन जल जाए

खिलता गुलाब

खिलते गुलाब की तुम कलि हो

काँटो में रह कर भी अनछुई सी हो

रंगों में रंगे तेरे लबों पे

दिल कह रहा बस मेरा ही नाम हो

Thursday, January 21, 2010

होली के रंग

आओ होली के रंगों में रंग जाए

रंगों की इस महफ़िल में

हर एक बेर भुला दे

लहू के बदले प्यार के

रंगों को भर दे

यह पावन संदेश

हर दिलो में बरसा दे

नतीजा

दिल लगाने की सजा है हमने पाई

इस दिल का क्या गुनाह

इसने तो अपनी वफा है निभाई

इससे ये मालूम ना था

दर्द जुदाई का क्या होता है

एक बेवफा से दिल लगाने का

नतीजा क्या होता है

अबीर गुलाल

उड़ रहा है अबीर गुलाल

चली आई है रंगों की बारात

रंगों के रंग में रंग रहे गाल

भर भर पिचकारी

हो रही है रंगों की बरसात

छा रही है रंगों की मस्ती

उड़ रहे है अबीर गुलाल

चोर

चोरों के शहर में आ गया गया चोर

कहलाता है दिल का चोर

दिन हो या हो रात करता है चोरी

जब किसी हसीना से हो मुलाक़ात

कातिल है उसकी निगाहें

नजरों से ही खोल डाले

दिल के सारे ताले

पकड़ा ना जाए कभी

वो है शातिर चोर

चुरा दिल हसीनो के

निकल जाए बहुत दूर

देख इस कला को

सभी चकित रह जाए

कहे चिल्ला चिल्ला

तू है हमसे भी बड़ा चोर

अपने से

तुम अपने से लगते हो

सच्चे दिल को लगते हो

तुम हो इतने अच्छे

हो मन के सच्चे

इस दिल में बस तुम ही रहते हो

तुम अपने से लगते हो

तुम जब मुस्कराते हो

प्यार के फूल खिलाते हो

इस दिल को तुम ही महकाते हो

तुम अपने से नजर आते हो

अच्छे इंसान

सपने हो निगाहों में

हसरते हो दिलो में

काबू हो जज्बातों पे

फिर क्यों ना जीवन साकार हो

खुदा जब बनना नहीं

संत जब कहलाना नहीं

तो फिर क्यों ना अच्छे इंसान हो

Wednesday, January 20, 2010

अपना तराना

हमने है दिल को समझाया

वो नहीं है अपना तराना

साथ उनके चल सकते नहीं

हमसफ़र बन सकते नहीं

वो तो है बस एक साया

छोड़ जाए साथ जब हो उजाला

हमने है इसलिए खुद को भुलाया

तरह तरह से दिल को बहलाया

कैसे कैसे इसको फुसलाया

तब जा इसकी समझ ये आया

वो नहीं है इस दिल का तराना

हमने है दिल को समझाया

नये संसार की कल्पना

सृष्टि कहे पुकार

मानव निंद्रा से तू अब जाग

टटोल खुद को

खगोल ब्रह्माण्ड को

पपोल धरा को

इनमे छिपे गुणों की कर पहचान

अंकुरित हो सके

नव विज्ञान का आधार

छिपे रहस्यों के खुल जाए राज

नये संसार की कल्पना का

सपना हो जाए साकार

स्वछंद

उन्मुक्त हो उडू गगन में

ना कोई बंधन ना जात हो

परिंदे की तरह विचरू नील गगन में

स्वछंद हो फिरू मस्ती में

सम्भोग से समाधी तक

जी भर जिऊ हर पल को

मुक्त रह जी लू प्रकृति ने दिए उस पल को

उन्मुक्त हो उड़ता फिरू गगन में

खुसनसीब

खुसनसीब है हम

जिनको आप जैसा दोस्त मिला

मन्नते करते है आप हमारे लिए

जाहिर उसे करते नहीं

जो आप करते हो दोस्तों के लिए

वो लोग अपनों के लिए भी करते नहीं

उधारी

उधारी भी एक कला है

कितने लोगो ने गुजार दी

जिन्दगी उधार की तरह

तिकड़म उधारी की है बड़ी आसान

इसकी टोपी उसके सर

गुड्मंत्र उधारी का है इसमें समाहित

जिसने है उधारी अपनाई

उसने उधारी में जीवन गुजार दी

जो खुद को समझते है ज्यादा ज्ञानी

उधारी के पचड़े से कभी

वो कभी निकल नहीं पाए अज्ञानी

दुल्हन

कहनी थी जो बात तुमसे

वो कह नहीं पाए

प्यार करते है तुझसे

कैसे तुझे बतलाये

कह नहीं पाए आज बात अगर

तो फिर नहीं कभी कह पायेंगे

कह रहा है मन मेरा

सीना चिर तुझको दिखलादे

इस दिल में बसी हो

उसका दीदार करा दे

पर पहले तुमको अपने

प्यार के बारे में बतला दे

देर हो जाए उससे पहले

दुल्हन बना तुझे ले जाए

अनसुना

लगता है उन खुशनसीब को

हम बदनसीब नजर नहीं आते

तभी सुनके भी अनसुना कर जाते है

बेचारा हम कह बगल से कन्नी काट निकल जाते है

Monday, January 18, 2010

नजराना

जिसने हमको रंज से उठा पलकों पे बैठा रखा है

उनको नजराना मैं क्या पेशे करू

चाँद तारे मिलते नहीं

खुशियाँ बाजार में बिकती नहीं

क्या तोहफा उन्हें भेंट करू

देख ताज मन को ये ख्याल आया

क्यों ना दिल अपना उनके नाम करू

पेशे खिदमत ये छोटी सी जान करू

नजराने में दिल अपना उनको भेंट करू

तोहफा ये वो ठुकरा ना पायेंगे

नजराना हमारा भी कबूल फरमायेंगे

लाजबाब कह के मुस्करायेंगे

गले लगा अपना बनायेंगे

तोहफा हमारा भी कबूल फरमायेंगे

बदनाम

पसंद नहीं आया साथ हमारा

छुड़ा चले गए हाथ हमारा

दिल बेचारा रह गया अकेला हमारा

पर समझ ना आप को बात हमारी

बिन तुम मिले नाम बदनाम हो गया हमारा

जिन्दा लाश

दम घुटने लगा साँसे थमने लगी

सुनके उनकी नाराजगी आँखे नाम होने लगी

धड़कने बड़ने लगी साँसे उखड़ने लगी

जो हमने किया नहीं उसकी सजा हमने पायी

बे मुरबत मौत भी हमको ना आयी

दर्द की लहर ऐसी आयी

हमको जिन्दा लाश बना गयी

अजर अमर

शाश्वत ईश्वर है नश्वर तन है

पहेली ये बहुत ही सरल है

ईश्वर की अनुकम्पा से

सृष्टि की ये देन है

सुंदर ये तन है

दिया जन्म जब रब ने

प्रेम क्यों तन से है

हर की अंतरात्मा में

विराजे प्रभु स्वयं है

इसीलिए आत्मा अजर अमर है

दिल में

सोचा है हमने आशिया एक बनायेंगे

तेरे दिल में घर अपना बनायेंगे

इस छोटे से दिल को प्यार की बगिया से मह्कायेंगे

छोटे छोटे सुंदर सपनों से इससे सजायेंगे

प्यार की रोशनी से इससे जगमगायेंगे

तेरे दिल में अपना आशिया बनायेंगे

पराया

खूब निभाई दोस्ती आपने

एक मुलाक़ात के बाद छोड़ दिया

हमें किसके आसरे

भूली बिसरी हो गई अपनी यारी

कल तक थे अजीज आपके

पल में कर दिया पराया आपने

Sunday, January 17, 2010

पंख

तम्मना बस इतनी सी है

ख्वाईस छोटी सी है

काश दो पंख हम को भी मिल जाते

उड़ के तेरे पास चले आते

तुम पलके झुकाती

इससे पहले तेरे नयनों

से काजल चुरा ले जाते

तेरी पलके बंद होते ही

हम फुर्र से उड़ जाते

तुम कुछ समझ पाते

इससे पहले हम तेरे दिल में

अपना आशिया बना आते

अनजाना सफ़र

निकाल पड़े अनजाने सफ़र को

कोई हमदम ना साथ था

मगर विश्वास एक पास था

कर राह था जो प्रेरित

राह कामयाबी की दूर थी

पर शिखर पास नजर आ रहा था

कदम बड़ते चले गए

ओर मंजिल करीब आती गयी

वीर जवान

माटी कह रही है पुकार

सुनलो मेरे वीर जवान

सरहद पे दुश्मन ने कर दिया है वार

मातृभूमि की करने रक्षा

शोर्य पराक्रम की गाथा लिखने

मेरे वीर सपूतों करने अपना जीवन बलिदान

हो जाओ तुम त्यार

पुकार रही है मातृभूमि आज

देश की लाज है अब तुम्हारे हाथ

सुनलो मेरे वीर जवान

दुश्मन को पीठ ना दिखलाना तुम

वतन की खातिर हँसते हँसते

प्राण न्योछावर कर जाना तुम

जीवन रथ

सुबह जब आँखे खुली तो

सूर्य का दीदार हुआ

देख रोशनी की चमक

जीवन मन हर्षित हुआ

छिटक रही किरणों की आभा से

दिल रोशन हुआ

लगा माथे तिलक

कर सूर्य को प्रणाम

जीवन रथ गतिमान हुआ

गजल

गजल तुम बन जाओ तो गीत हम बन जाए

दोनों जो मिल जाए तो संगीत बन जाए

कुदरत ने दिया है साथ तो क्यों ना सरगम बन जाए

आओ हम तुम मिल इस साज की धुन बन जाए

एक सुन्दर रचना बन एक दूजे की प्रेरणा बन जाए

खपा

खपा तुझसे हो सकते नहीं

दूर तुमसे रह सकते नहीं

तुम मानो या ना मानो

जुदा तुझसे हो सकते नहीं

मनमीत

जब से तुमको देखा है

दिल दीवाना हो गया है

तेरे इश्क में ये तो बेगाना हो गया है

जादू तेरे हुस्न का चल गया है

जब से तुमको देखा है

दिल दीवाना हो गया है

सुनता है सिर्फ तेरे ही गीत

बन गया तेरा मनमीत

जब से तुमको देखा है

दिल दीवाना हो गया है

आप जैसा

फासले दरमियाँ है

पर दिल तो दिल के पास है

मुस्करा रही है जिंदगानी

आप जो हमारे साथ है

सिमट गई दुनिया

मिट गए फासले

जब आप जैसा दोस्त हमारे साथ है

करीब

जब नहीं हो कोई पास

समय गुजरने करना हो कोई काम

करना तुम हमें याद

खो जाओगी सपनों की दुनिया में

पाओगी खुद को परियोकी दुनिया में

लगोगी परियो की शहजादी

फिर भी जो वक़्त कटे नहीं

कर आँखे बंद राख दिल पे हाथ

करना हमें तुम याद

खुद को हमारे करीब पाओगी

दोस्ती के रंग

आओ जिन्दगी को फूलों के रंग से रंग दे

आसमा को नीले रंग से रंग दे

रह जाए ना कोई जगह खाली

इस जहान को दोस्ती के रंग से रंग दे

आओ जिन्दगी को फूलों के रंग से रंग दे

नई सुबह

क्या लिखू इस नई सुबह के लिए

ऐसी हसीन पहले कभी ना थी

ओस में लिपटा तेरा मासूम चेहरा

ज्यों खिलते गुलाब की कलि थी

इससे अच्छी सुबह ओर हो नहीं सकती

खुलते ही आँखे तू ही दिल के पास थी

Friday, January 15, 2010

फैसला

खाब जो आपने देखे शायद वो हम नहीं

गम कोई नहीं जो पल दो पल का ही साथ सही

दिल कहे ऐतबार करूँ कैसे

जो परिचय दिया आपने उसपे यकीं करूँ कैसे

फिर भी वादा जो किया उसे निभायेंगे

एक शाम दोस्ती के नाम कर जायेंगे

फैसला होगा आप का

या तो दोस्त बनाओगे

या सीने में खंजर घोंप जाओगे

दोस्ती के नाम

मित्र जो आप जैसा हसीन हो

तो क्यों ना फिर खाबों के पंख हो

ना कोई बंधन हो ना कोई दीवार

आओ मिलके लिखे एक पैगाम दोस्ती के नाम

मंजूर अगर हो करना इकरार

ना हो तब भी ना करना इनकार

हरी दर्शन

हरी दर्शन से मन भरे नहीं

टकटकी लगाये निहारु श्याम बिहारी को

नजर गिरधारी से हटे नहीं

बस गई छबि मोहन की नयनों में

दिल अब श्याम नाम दूर नहीं

हरी दर्श एक बार तो दे दो

मन अभी तलक भरा नहीं

हाँ

दूरियां मिटाने सिर्फ़ एक मुलाक़ात ही काफ़ी है

जिन्दगी गुजारने सिर्फ़ तेरा साथ ही काफ़ी है

ख़ुद को भुलाने सिर्फ़ तेरा प्यार ही काफ़ी है

जो तू हाँ कह दे तो एक मुलाक़ात ही काफ़ी है

दोस्ती का जिक्र

पहले कभी मिले नहीं

एक दूजे को देखा नहीं

कशीश फिर भी कोई है

मीठी चुभन अनछुई सी है

मिले चाहे अनजाने में ही सही

वादा दोस्ती का जो किया

उससे कभी मुहँ मोड़ेंगे नहीं

जब कभी जिक्र होगा दोस्ती का

हम आप अछूते रहेंगे नहीं

Thursday, January 14, 2010

ख्याल

हर शाम एक ख्याल आए

हर ख्याल में तेरा ही अक्स नजर आए

आँखे खुली हो या बंद

बस तेरा ही नूर नजर आए

नूर ऐसा की कोई ओर नजर ना आए

बस तू ही तू नजर आए

आघात

रक्तिम रक्तिम रक्त बहे

लहुलुहान शहर दिखे

गूंज रहा है कोलाहल

हर ओर मची है पुकार

फैले पड़े है लाशों के अम्बार

किसी दहशतगर्द ने फिर से

लिख दिया काला अध्याय

इंसानों के शहर को बना दिया शमशानघाट

देख इस भयावह मंजर को काँप उठा इंसान

मन कह उठा चीत्कार

खुद को कहना मनुष्य है अभिशाप

खो गई चेतना शून्य में

मानवता को दे गई जबरदस्त आघात

ढोल की थाप

बाजे मृदंग ढोल नगाड़े

नाचे मन उड़े आँचल

पपीहे की पिहू पिहू

दिल को छू जाए

बाजे झांझर उड़े गुलाल

सुन के सरगम की ताल

मृदंग और ढोल की थाप

नाच रहा है मन बार बार

Monday, January 11, 2010

नफरत

की होती नफरत यदि

तो लोट के फिर ना आते

तुम अगर मर भी जाते तो भी

जनाजे को कांधा लगाने नहीं आते

आंसुओ का साथ

जिन्दगी में एक आंसुओ का ही साथ है

बाकी सब नाम के साथ है

सच्चे दोस्त होते हैं आंसू

खुशी ज्यादा हो या हो गम

साथ निभाने तुरंत चले आते है

दे तस्सली मन को

खुशियों से सराबोर कर जाते है

जब तलक रहती है जिंदगानी

तब तलक साथ निभाते है

आंसू सच्चे हमदर्द कहलाते है

अनमोल आंसू

हर आंसुओ को सहेजा है

मोतियो की माला में गुंथा है

अनमोल है ये आंसू

सहेज के इनको आँखों में रखा है

बेवजह निकल ना जाए आंसू

आँखों को बंद कर रखा है

लग गई जो आंसुओ की झड़ी

माला अश्को की पिरो ना पाऊंगा

आंसुओ की कीमत को जाना है

हर आंसुओ को इसलिए खूबसूरती से सहेजा है

नफासत से इनको आँखों में कैद कर रखा है

हमराज

हमने दर्द को हमराज बना रखा है

दर्द को सीने में छिपा रखा है

इसको जीने का जरिया बना रखा है

हर दर्द में जीने का एक राज छुपा रखा है

हमने दर्द को हमराज बना रखा है

दर्द हद से गुजर ना जाए

राज कहीं खुल ना जाए

आंसुओ को इसलिए साथ रखा है

तन्हाइयो ने दर्द को घेरा है

फिर भी हमने दर्द को हमराज बना रखा है

दर्द सीने में छुपा रखा है

तुम को

यार तुमको भुला ना पाये

ख़ुद से ख़ुद को जुदा ना कर पाये

हसीन थी तेरी हँसि

उसको भुला ना पाये

तेरे संग बीते लहमों की

यादो से दूर ना जा पाये

तेरी कशीश को भुला ना पाये

तुझ से किए वादे को तोड़ ना पाये

तुम को अकेला छोड़ ना पाये

ख़ुद को तुम से जुदा ना कर पाये

दूर होके भी दूर हो ना पाये

यार तुम को भुला ना पाये

छुपाऊ

जितना दर्द छुपाऊ उतना वया होता है

दिल जब रोता है आँखों से बरसता है

सुनाई देती नहीं रुंदन चोरी चोरी ये रोता है

दिखते नहीं आंसू बारिस की बूंदों में घुल जाते है

सुनी आँखे फिर भी दिल का दर्द वया करती है

देख अपनों को आँखे छल छला पड़ती है

दर्द जितना भी छिपाऊ उतना ही वया होता है

तहलका

मिल जायेगी ख़बर तुम को भी वो

हिला दिया जिसने सबको

मचा दिया तहलका चारों ओर

खोल दी सबकी पोल

हँसते हँसते हो गए लोट पोट

ख़बर कुछ विशेष ना थी

पर मसाला लगा बना दी गई विशेष

किया गया प्रचार ऐसा

फ़ैल गई सनसनी हर ओर

दुबक गए सभी घरों में

छिप गए लिहाप में लोग

ख़बर बस इतनी सी थी

आज नही कोई ख़बर

इसलिए कल मिलेगा नहीं समाचार पत्र

Saturday, January 9, 2010

अंधविश्वास

बने साधू संत अनेक

रचे गए ग्रन्थ अनेक

पर समझा ना सके

इनका मर्मरग्य कोई एक

खो गई वो ओजस्व वाणी

भूल गए गीता उपदेश

फ़ैल गए पाखंड के दानव

नजर आ रहे है सिर्फ़ आडम्बर ही आडम्बर

बाँट रहे है अंधविश्वास और वहम के प्रसाद

पढ़ा रहे है ज्ञान की जगह अज्ञान के पाठ

रब सुन रहा है

दिल कह रहा है

रब सुन रहा है

दुआ कर रहा है

तुम खुश रहो सदा

मन ये कह रहा है

होगी हर दुआ कबूल मेरी

हर जनम होगी तू ही मेरी

हर दुआ में बस तेरा ही नाम है

बिन तेरे जीना दुश्वार है

होती नही कबूल दुआ

जब उसमे शामिल तेरा नाम नही

मेरी आरजू

तुम रहो खुश सदा

बस यही है दुआ मेरी

उमर मेरी भी लग जाए तुझे

यही तम्मना है मेरी

नजर ना किसी की लग जाए

बस यही है आरजू मेरी

उदासी

उदासी चहरे से हटती नहीं

लाख छुपाऊ मगर छुपती नहीं

चहरे बदल लू हज़ार

मगर हँसि से दर्द की झलक जाती नहीं

छिपा लू ख़ुद को कहीं

तो भी मगर दिल के रोने की आवाज़ जाती नहीं

क्या करूँ उदासी चहरे से हटती नहीं

Friday, January 8, 2010

अकेला

बिन कहे तुम चले गए

तड़पने के लिए अकेला हमें छोड़ गए

एक बार दिल से पुकारा तो होता

हमको अपने करीब पाया तो होता

वजह क्या थी ये तो बतलाते

यू अकेला छोड़ तो नही जाते

दिल का सागर

छलक रहा है दिल का सागर

भर लो आके मन का गागर

बह रही है प्रेम रस धारा

कह रही है करीब तू आ जा

मगन हो जाए भूल जाए

उमंग भरी दिल की वादियों में

एक दूजे में खो जाए

मन के बोल

होले होले दिल ये डोले

बोले बोले मन ये बोले

रहती है तू इस दिल में

धड़के दिल मेरा तेरे ही वास्ते

कहती है मेरी साँसे

रगों में बहती है तेरी ही यादे

रोशन तुझ से ही मेरी आँखे

तुझ से ही है मेरी राते

नजर ना लग जाए कहीं

छिपा ले ख़ुद को आके मेरी बांहों में

होले होले दिल ये डोले

बोले बोले मन ये बोले

परम पूज्य पिताश्री

जब जब विपदा आई

थामी रखी आपने डोर

कर ना सकी वो की दुह्साहस

लगन और कर्मठ बेक्तित्व से आपने

जीत लिया फिर से हारा हुआ संसार

सची निष्ठा और लगन की आप हो मिशाल

प्रेरणा बन सिखला दिया कर्तव्य बोध पाठ

थमा हमारे हाथो में जीवन रथ की डोर

चले गए आप वैकुंठ लोक

वैकुंठ गमन की तिथि

दो फूल हमारे भी स्वीकार करो

सर पे हमारे सदा रखना अपना हाथ

हुई हो कोई भूल तो करना हमें माफ़

Sunday, January 3, 2010

जीना है

जीना है हर उस पल को

जो कुदरत ने बख्शे है

अरमानो से सजी डोली को

वक़्त रहते पूरा करना है

छोटे दिल के बड़े खाव्बों को

सच करना है

जी भर जिन्दगी के हर लहमे को जीना है

तू मैं

कौन तुम हो कौन मैं हु

उलझा हुआ बड़ा ही मसला है

क्यों ना ऐसा करे

हल कोई ऐसा निकाले

फिर ना कभी तू तू मैं मैं हो

पहचान कहीं खो ना जाए

बेहतर यही हो

तुम तुम हो मैं मैं हु

इससे अच्छा ओर कोई समाधान नहीं

सुलझ जायेगी उलझन

जो इस पहेली को समझ जाओगे

ना कहो

कभी ना कहो अलविदा

भूलके सारे गिल्वे सीके

लगा लो जिन्दगी को फिर गले

कभी हंसाये जिन्दगी

कभी रुलाये जिन्दगी

जैसी भी है ह हसीन जिन्दगी

खुशी और गमों का सागर है जिन्दगी

जिन्दगी से लड़ना ही है जिन्दगी

जिन्दादिली की मिशाल है जिन्दगी

सीखलो सबक ये जिन्दगी

अब ना कभी कहो अलविदा ये जिंदगानी

खबर

किसको किसकी खबर है

सारा जहां बेखबर है

मतलबी है दुनिया

रिश्ते नाते है छलावा

सबको बस अपनी ही लगी है

किसको किसकी खबर है

फुर्सत नहीं है किसीको

मिलने मिलाने की

याद आती फिर नहीं

मुराद जब हो जाए पूरी

किसीको किसीकी खबर ही नहीं

मटर

चटर पटर मटर

रपट पकड़ पटक

सटर मगर गटक

फटर फटर ना कर

टहर डपट झपट

लटर पटर ना कर

खट पट खट पट ना कर

मुहफट सट्टा सट गटक

झटपट सरपट खा ले मटर

कहीं बन्दर गिरा न दे गटर के अन्दर

मन की ताल

कह रही है मन की ताल

दोहरा रही है एक ही बात

नगमे ऐसे गाऊ

संगीत ऐसा बनाऊ

सुनके जिसकी मधुर तान

थिरकने लगे सभी भूल सारे दुःख

सरगम ऐसा गुनगुनाऊ

साज ऐसी बजाऊ

सुनके जिसकी मधुर राग

झुमने लगे धरती आकाश

कह रही है मन की ताल

करू ऐसी सप्त लहरी की धुन तैयार

मोहताज

कल तक जिनके सर के थे ताज

आज उनके दीदार को भी है मोहताज

सिला बेवफा ने ऐसा दिया

गुमनामी की गलियो हमें अकेला छोड़ दिया

सितम ऐसा दिया

मौत से भी बदतर जिन्दगी के हवाले हमें कर दिया

Saturday, January 2, 2010

दिशाहीन

चलते चलते कदम थक जायेंगे

जब ना कोई लक्ष्य होगा पास

दिशाहीन हो भटकते रह जाओगे

जो हताशा में मायूसी का दामन थाम लोगे

इमारत

ढह गयी इमारत

हिल गयी बुनियाद

कमजोर थी नीव

भारी था मकान

संभाल ना सकी बुनियाद

इमारत का भारी भार

शुमार

आरजू है बस इतनी सी

अनन्त तारो की महफ़िल में

मैं भी शुमार हो जाऊ

झिलमिलाऊ जगमगाऊ

अपनी रोशनी से

अँधेरी राते रोशन कर जाऊ

आंधियो से लडती शमा की तरह

आसमा में दीपक बन टीमटीमाऊ

जायका

रूचि बदल जाती है

आदते सुधर जाती है

जब स्वाद कोई नया मिल जाता है

तब जायका ही सारा बदल जाता है

स्वागत नए साल का

आओ करे कुछ इस तरह स्वागत नए साल का

खुशियाँ बटती रहे साल भर

बधाईया मिलती रहे साल भर

करता रहे रोशन जहाँ साल भर

दीपक नए जलते रहे साल भर

आओ करे कुछ इस तरह स्वागत नए साल का