Saturday, June 24, 2017

वाकिफ़

दुनिया कहती है तू निराकार हैं

पर मैं कहता हूँ मेरा हृदय ही तेरा आकार हैं

अहंकार नहीं यह जज्बात हैं

क्योंकि इसकी धड़कनों में

तेरी ही रूह का बास हैं

आत्मा से परमात्मा के मिलन का

यही एक सच्चा मार्ग हैं

ना मैं तपस्वी हूँ

ना ही मैं दानी हूँ

फिर भी संयम बल से ज्ञानी हूँ

इसीलिये

विधमान हैं तू इस दिल में

इस ज्ञान से मैं भी वाकिफ़ हूँ







Sunday, June 11, 2017

सात फेरे

मुस्कान ने उनकी कहर बरपा दिया

दिल की इस नाजुक जमीं पर

वज्रपात का कोहराम मचा दिया

आघात गहरा इतना था

सहम गया पूरा तन बदन

सदमा झेल ना पाया ए मन

ओर हो गया इसका चीरहरण

दिल भी यह कहां उनसे कम था

कम्बख्त ने बना लिया

उनकी हसीं को ही अपना हमसफ़र

बाँध लिया बंधन में उनको

फिर सात फेरों के संग

सात फेरों के संग

दो जाम

पिला दिए उन्होंने आँखों के जब दो जाम

हो गयी मदहोश रूह की चाल

फ़ना हो गया साया भी ख़ास

मटकायें उन्होंने जब नयनों के ताव

चढ़ गया सुरूर नशे का

पेंच लड़ गए जब उनके कजरों के साथ

ऐसी बरस रही मदिरा उनके नजरों के साथ

पीछे छूट गयी जिन्ने मधुशाल की हर बार

पैमाने छलक रहे अब इस दिल के

उनके नयनों के मयखानों के साथ

उनके नयनों के मयखानों के साथ

Tuesday, June 6, 2017

इंतजार

वेदना अपनी बयाँ ना कर पाया

किताब के पन्नों पे इसे उकेर ना पाया 

रोशनी चुरा ले गया कोई काफ़िर हमारी

भटका गया मंजिल से राह हमारी 

पाना जिस मंजिल को कभी हसरतें थी हमारी 

कशिश अधूरी रह गयी थी वो हमारी 

आलम अब तो बस बेबसी का संग था 

रूह जलाने को

यादों का अग्नि कुंड पास था

ना दरियां में अब वो तूफां था

ना हवाओँ में वो आगाज़ था

सुन ठहर जाती थी मंजिल जिसे कभी

अफसानों का वो तिल्सिमि पिटारा अब पास ना था 

बुझते चिलमन को रोशन रहने

उस शमा का फिर भी इंतजार था

फिर भी इंतजार था 

Sunday, May 14, 2017

भीड़ में

अक्सर मैं ख्यालों में खोया रहा

पहेली बन ख़ुद को टटोलता रहा

कभी सपनों की उड़ानों में

कभी उलझनों के नजारों में

पहचान ख़ुद की तलाशता फिरा

गुम रहे विचारों की ताबीर में

पर रूबरू खुद से कभी हो ना सका

उधेड़ बुन की इस कशमकश में

मैं भी शायद तन्हा खड़ा था

दुनिया की इस भीड़ में

दुनिया की इस भीड़ में

Wednesday, April 12, 2017

उम्र कैद

गुनाह मेरे ख्बाबों का कहा था

शरारत भी उनकी मासूमियत भरी थी

पेंच लड़े नयनों के थे

पतंग पर वो दिल की काट गए थे

लावण्य उनके रूप का ना था

फ़िज़ा में बहार उनके चिलमन की थी

गुलाब सी खिलती, इत्र सी महकती, हँसी उनकी

अनजाने में जुर्म ए करवा गयी

आजीवन उम्र कैद की बेड़ियाँ इन हाथों को पहना गयी


इन हाथों को पहना गयी

Sunday, March 19, 2017

अंशदान

वो ठहराव ही ना मिला जिसका इंतजार था

माना धाराओं का वेग कही शांत तो कही प्रचंड था

पर लहरों के थपेड़ों से टूटते

किनारों का मंजर ही सिर्फ सामने था

हर गुजरते लहमों का इसे बखूबी अंदाज़ था

पर कहने को भी पास अपने

इस जिंदगानी का हिसाब ना था

कभी दरख़्तों में तो कभी पर्वतों में

खो जाने का जूनून जो साथ था

पास इसके भी मगर

बिखरी मंजिलों का सच साथ था

शायद रूह का

आँधियों से लड़ने का हौसला पस्त था

चमक भी वो विलुप्त सी प्रतीत थी

समर बेंधने की कला में जिसे पारंगत हासिल थी

शून्य भँवर का वेग भी

कुछ ऐसा ही गतिमान प्रतिबिंबित सा था

साधना पल, ध्यान भी मानो

रूह से अपनी विरक्त सा था

ठहराव की इस व्यथा में

मानो सृष्टि की संरचना का भी

अपना कुछ अंशदान सा था

कुछ अंशदान सा था